शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

इसीलिए राज्यों में जिहाद और केंद्र में साथ साथ।

इसीलिए राज्यों में जिहाद और केंद्र में साथ साथ।
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

सत्ता के केंद्रीयकरण की वजह से बागी तेवर अपनाने के बावजूद राज्यों में सत्तादलों के सामने केंद्र के सामने आत्मसमर्पण करने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचता है।केंद्र से पंगा लेकर राज्यों का राजनीति चल ही नहीं सकती।

मसलन  मायावती और मुलायम दोनों परस्परविरोधी दल हैं और यूपी मेंं इनमें से कोई दूसरे के लिए एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है।लेकिन दोनों पार्टियां केंद्र सरकार को समर्थन देते रहने को मजबूर हैं।माना जा रहा है कि सीबीआई के पास अब भी तकनीकी रूप से आय से अधिक संपत्ति मामले में मुलायम सिंह और मायावती के खिलाफ मामला बनाए रखने के कई रास्ते हैं।

इसीतरह तमिलनाडु में सत्ता में चाहे द्रमुक हो या अन्नाद्रमुक केंद्र के साथ नत्थी हो जाने की उसकी अनिवार्य परिणति है।

भारतीय संविधान में संघीय ढांचा के तहत कानूनी हक हकूक का बंटवारा तो हुआ है लेकिन राजस्व और संसाधनों के मामले में राज्य सरकारे केंद्र पर ही निर्भर हैं।

निरंतर हो रहे कानूनी संशोधन के मार्फत मुक्त बाजारी अर्थव्यवस्था में उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो जाने की वजह से आर्थिक तौर पर लगातार खस्ता हाल होते जा रहे राज्य राजकाज के लिए केंद्र पर ही निर्भर होते जा रहे हैं।तो दूसरी ओर संपन्न राज्यों की राजनीति भी केंद्र से ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की सौदेबाजी पर टिकी होती है।

जाहिर है कि वोटबैंक साधने के लिए राज्य राजनीति में आग उगलने के बावजूद राज्यों के सत्तदलों के लिए केंद्र को पैकेज,अनुदान,विकास,योजना,मदद के बहाने केंद्र के साथ नत्थी हो जाना मजबूरी है।

जैसा कि भूमि अधिग्रहण संशोदन कानून के सिलसिले में देखा जा रहा है कि एकमात्र वामपंथी त्रिपुरा की सरकार गुजरात सरकार के साथ मिलकर हाल में लागू नये भूमि अधिग्रहण कानून को रद्दी में डालने की मांग कर रही है तो सुर में सुर मिलाने लगी हैं राज्यों की तमाम कांग्रेसी सरकारें भी।

सही है कि कांग्रेस बुरी तरह चुनावों में पराजित है।

सच यह भी है कि संसद में केसरिया सरकार को पूर्ण बहुमत है।

लेकिन गैर कांग्रेसी भाजपाई पार्टियों की ताकत अब भी कम नहीं है।

अन्नाद्रमुक,टीएमसी और बीजू जनतादल की ताकत बढी है। सीमांध्र और आंध्र में सत्तादल तो  फिरभी राजग के घटक हैं।लेकिन इन तीनों पार्टियों ने शुरु से ही राज्यसभा में अल्पमत सरकार की जमानत के इंतजाम में जुट गयी है।

गैर भाजपाई सांसदों की कुल ताकत उतनी कमजोर भी नही है।लेकिन संसद में सासद अपनी अपनी राज्यसरकार के हित में बैटिंग करते देखे गये।इसीलिए मामूली रस्म अदायगी के अलावा बजट पर संसद में चर्चा हुए बिना वित्त विधेयक इतनी आसानी से पास हो रहा है।

वंचितों के हक हकूक के मामले में राज्यों और केंद्र का रवैया समान है।विकास के पीपीपी  गुजरात माडल चूंकि सर्वव्यापी है औरसारी पार्टियां कारपोरेट हितों के मुताबिक काम कर रही हैं तो दमन उत्पीड़न नागरिक मानवाधिकारों के हनन में राज्यों और केंद्र का चोली दामन का साथ है।

ममता बनर्जी के भाजपा विरोधी जिहाद में इसीलिए केंद्र की आर्थिक नीतियों के बारे में एक शब्द भी नहीं होते तो मुलायम,मायावती से लेकर बागी नीतीश कुमार जैसे भी आर्थिक नीतियों पर खलकर बहस करने के बजाय धर्मनिरपेक्षता को मुद्दा बनाये हुए हैं या मूल्यवृद्धि पर मामूली शोरशराबा है संसद के भीतर और संसद के बाहर।बुनियादी मुद्दों पर कहीं सवाल ही खड़े नहीं किये जा रहे हैं।

राज्यपाल इस समीकर को साधने का सबसे बेशकीमती साधन है। केंद्रीयम मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति भी राज्यपालों के कार्यकाल के असमय अवसान के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद है वैसे ही राज्यपाल भी संवैधानिक पद तो हैं लेकिन राजभवन से राज्य की राजनीति में केंद्रीय वर्चस्व और हितों केलिए काम करना उनके प्रथम और अंतिम कार्यभार हैं।

इसीलिए केंद्र में सत्ताबदल हो जाने के बाद राज्यपालों की छुट्टी का सिलसिला भी चालू हो जाता है।

बंगाल में  पुराने राज्यपाल की विदाई ममता बनर्जी की इच्छा के विपरीत हो गयी और कल्याण सिंह को बाबरी विध्वंस मामले की वजह से बंगाल में तैनाती रोकने की उपलब्धि के बावजूद केसरीनाथ की नियुक्ति वे  टाल नहीं सकीं।

21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद भाजपा राज्य में बड़े-बड़े सपने देख रही है। लेकिन उसके सपने पूरे नहीं होंगे। अगले चुनाव में यह दोनों सीटें भी उसके हाथों से निकल जाएंगी।

अब ट्राई कानून में संशोधन क बाद बाकी कानून बदलने में भी दीदी और मोदी विकास और जनहित के हवाले साथ साथ हैं।

धर्मनिरपेक्षता का फंडा जाहिर है कि अपने अपने वोटबैंक साधने की कवायद है।

अब अपने सिंगापुर दौरे से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तीन अगस्त से तीन दिवसीय दौरे पर दिल्ली जा रही हैं। देखते रहिये,क्या क्या गुल खिलते हैं इस मानसून में।

केसरीनाथ ने बंगाल के राजभवन में प्रवेश करते न करते संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए राजनीति हिंसा भी बंद करने की चेतावनी जारी कर दी है।

शारदा फर्जीवाड़े मामले में सांसदों,मंत्रियों,पार्टी नताओं के अलावा दीदी खुद आरोपों के घेर में है।कुणाल और सुदीप्त के भी राजसाक्षी बन जाने की आशंका है।

पश्चिम बंगाल पुलिस के कुछ अधिकारी शारदा घोटाले से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेजों को कथित तौर पर नष्ट करने को लेकर सीबीआई के निशाने पर हैं।
सीबीआई सूत्रों ने कहा कि बार बार अनुरोध किए जाने के बाद भी उन्हें पश्चिम बंगाल पुलिस से घोटाले से संबंधित पूरे दस्तावेज नहीं मिले हैं। इससे यह आशंका पैदा हो रही है कि उनमें से कुछ दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया हो।
उन्होंने कहा कि अगर यह स्थापित हो जाता है कि घोटाले से जुड़े अहम दस्तावेज अधिकारियों द्वारा जानबूझकर नष्ट किए गए, एजेंसी दस्जावेजों को नष्ट करने के लिए उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू कर सकती है।
सूत्रों ने कहा कि सीबीआई समझती है कि घोटाले की जांच के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस ने बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए थे और सभी दस्तावेज एकत्र करना कठिन है। चिटफंट योजनाओं के सरगनाओं ने हजारों निर्धन लोगों के पैसे एकत्र उनमें गड़बड़ी की।


सांसदों, विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ दूसरे गंभीर आरोप भी हैं।

सांसद तापस पाल पर तलवार लटक रही है।

जांच एजंसियां नवान्न में दस्तक देने लगी हैं।

नये सेलिब्रिटी सांसद मिथुन चक्रवर्ती तक घिरने लगे हैं।शारदा चिटफंड घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने बुधवार को फिल्म अभिनेता और डांसिंग स्टार मिथुन चक्रवर्ती से 8 घंटे की पूछताछ की है।

मालूम हो कि मिथुन चक्रवर्ती इस समय तृणमूल कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सांसद हैं।

मिथुन से ईडी ने उनके घर पर ही पूछताछ की जिसमें मिथुन ने ईडी को अपने और शारदा ग्रुप के रिलेशन के बारे में बताया और खबर है कि उन्होंने कुछ दस्तावेज भी निदेशालय को सौंपे हैं।

मालूम हो कि मिथुन से पूछताछ पहले ही होनी थी लेकिन मिथुन तब भारत में नहीं थे इसलिए उनका बयान अब रिकार्ड हुआ है। वैसे आपको बता दें कि शारदा चिट फंड घोटाले के सरगना सुदीप्त सेन और निलंबित तृणमूल कांग्रेस के सांसद कुणाल घोष समेत छह आरोपी इस समय जेल में हैं।

बाकी राज्यों में भी सत्तादलों की तस्वीर यही है।

इसीलिए राज्यों में जिहाद और केंद्र में साथ साथ।


आइये,सूचनाओं के केसरिया परिदृश्य को पहले समझ लें!

आइये,सूचनाओं के केसरिया परिदृश्य को पहले समझ लें!
पलाश विश्वास
जाय मुखर्जी की तरह मेरे होंठों पर कश्मीर की वादियों की युगलबंदी में कोई गीत सजने वाला नहीं है। जन्मजात काफी बदसूरत होने की वजह से अपरपक्ष के लिए मेरे प्रति आकर्षण कम है।हालांकि मेरी मां सुंदर थीं जबकि मेरे पिता भी  मेरी तरह एकदम निग्रो जैसे ही थे। हालांकि मेरी पत्नी भी सुंदर हैं।दोनों महिलाएं हमारे परिवार में यथारीति मरने खपने को चली आयीं।नस्ल सुधारने के लिए ऐसी महिलाओं का आभार।

यह सौभाग्य ही कहा जाना चाहिए कि कैशोर्य और जवानी में अप्रत्याशिक लिफ्ट की गुंजाइश करीब करीब शून्य होने की वजह से हम पवित्र पापी बनने का मौका कभी पा नहीं सकें।

नैनीताल में जीआईसी से ही लगातार एमए तक की पढ़ाई के कारण अमेरिकी,यूरोपीय और जापान की विकसित बयारें हमें यदा कदा छूती ही रही हैं।एक वक्त तो हम लोग भी हिप्पी और गिन्सबर्ग से भी प्रभावित थे तो ओशो से भी।

फिरभी हमारे भटकाव की गुंजाइश बेहद कम थीं।

हमारी कविताओं और गीतों,कहानियों में रोमांस और सेक्स पर 1973-74 में ही हमारे गुरुजी ताराचंद त्रिपाठी ने जीआईसी नैनीताल में ही वीटो दाग दिया था।

मोहन ओशो भक्त था और महर्षि वात्सायन की तरह कामशास्त्र का नया संस्करण लिखना शुरु कर चुका था,गुरुजी ने ही तत्काल उस पर फूल स्टाप लगा दिया  था।

उन्होंने ही हमें मार्क्स और माओ के साथ फ्रायड और हैवलाक एलिस का पाठ भी दिया।उन्हीं के सान्निध्य की वजह से विचारधाराओं का अध्ययन हमारे लिए दिनचर्या बन गया।उनकी वजह से नोट्स के बजाय पाठ हमारे लिए अनिवार्य था।

वे हमेशा चेताते रहे कि भारतीय समाज बंद समाज है,वर्जनाओं के दरवाजे खिड़कियां टूटेंगे तो कुछ भी नहीं बचेगा।न मूल्यबोध, न नैतिकता और न संस्कृति।जो हम सच होता हुआ अब देख रहे हैं।

संजोग से हमारे गुरुजी अब भी हमारा कान ऐंठते रहते हैं।

जाहिर है कि हमारे लिए भटकाव के रास्ते बन ही नहीं सके हमारे गुरुजी की वजह से।हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी पीढ़ी के गुरुजी संप्रदाय से हमारे बच्चों का वास्ता नहीं पड़ा वरना इस सांढ़ संस्कृति से भी एस्केप एवेन्यू निकल सकते थे।

लेकिन हम लोग रोमांटिक कम भी नहीं थे।ख्वाब सिलिसिलेवार हम लोग भी देखते थे।मूसलाधार बारिश में भी भीगते थे और हिमपात मध्ये बंद दीवारों में कैद भी न थे हम।उन्हीं दिनों हमारे रिंग मास्टर बन गये महाराजक गिर्दा।

गुरुजी चार्वाक दर्शन के अनुयायी थे त गिरदा भी कम न थे।

रात रात भर हिमपात मध्ये या दिसंबर जनवरी की कड़ाके की सर्दी में झीलकिनारे मालरोड पर तल्ली मल्ली होते हुए हम लोग देश दुनिया पर चर्चा करते थे।

पत्रकारिता के शुरुआती दौर में भी संपादकीय में जोर बहसें होती थी,जिसमें संपादक नामक विलुप्त प्राणी की अहम भूमिका होती थी।

आवाज जैसे धनबाद के छोटे अखबार में भी अजब गजब चामत्कारिक माहौल था।रांची के प्रभातखबर में भी।जागरण और अमर उजाला में भी।वीरेन डंगवाल जैसे लोग संपादकों पर भारी थे।

जनसत्ता के शुरुआती दौर में यह बहस संस्कृति प्रबल रही है।अभयकुमार दुबे इसके लिए हमेशा याद किये जायेंगे।

अब न वह संपादकीय विभाग है अब और न वैसे संपादक हैं।

हमने अबतक अमित प्रकाश सिंह जैसा कोई काबिल संपादक देखा नहीं है।सूचनाओं के प्रति इतने संवेदनशील,संपादन में इतने सिद्धहस्त।लेकिन हमारी उनसे कभी पटी नहीं।किससे क्या काम लेना है,इसका प्रबंधन उनसे बेहतर किसी को करते नहीं देखा अब तक।

हमारी नजर में तो पत्रकारिता के असली मसीहा कवि रघुवीर सहाय थे,जिन्होंने हम जैसे नौसीखिया टीनएजरों को पत्रकारिता का अआकख पढ़ाया दिल्ली से देशभर में बिना अपना कुनबा बनाये।

प्रभाष जी ने जो टीम जनसत्ता की बनायी थी,उसमे मंगलेश लखनऊ से आये थे लेकिन वे सहाय जी के बेहद नजदीदी थे लेखन के जरिये। जवाहरलाल कौल,हरिशंकर व्यास और दूसरे मूर्धन्य लोग,जिनकी भूमिका जनसत्ता को आकार देने की रही है,वे दिनमान में रघुवीर सहाय के सहयोगी ही थे।इस बात की शायद ज्यादा चर्चा नहीं हुई।

विचार विनिमय में सहाय जी बाकी लोगों से ज्यादा लोकतांत्रिक थे।गौर करें कि उनके संपादकीय सहयोगियों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से लेकर श्रीकांत वर्मा जैसे लोग भी रहे हैं।हम जैसे अत्यंत जूनियर बच्चों में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का बोध पनपाने वाले वे ही थे।

जिसतरह अमित जी के साथ वर्षों काम करने के बावजूद हमारे मधुर संहबंध नहीं थे.जिसतरह प्रभाषजी या अच्युतानंद मिश्र से हमारी पटती न थी,उसीतरह जनसत्ता के मौजूदा संपादक ओम थानवी से हमारा कभी संवाद नहीं रहा है। हालांकि दिल्ली और अन्यत्र हमारे कई अंतरंग मित्रों से उनकी घनिष्ठता है लेकिन मैंने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया।कोलकाता संस्करण के प्रति मैनेजमेंट की लगातार उदासीनता का जिम्मेदार भी हम उन्हें मानते रहे हैं।इसलिए जब भी वे कोलकाता और जनसत्ता रहे,कहीं भिड़ंत न हो जाये या कोई अमित प्रकाश जैसी अप्रिय हालत न बन जाये,इसलिए मैं आकस्मिक अवकाश लेकर अनुपस्थित भी होता रहा हूं।

मजे की बात है कि अमित जी एकमात्र व्यक्ति हैं जो मुझे छात्रावस्था से जानते रहे हैं।इंदौर में नयी दुनिया में जब वे थे उनको मैं वैसे ही जानता था,जैसे इलाहाबाद में अमृतप्रभात से मंगलेश डबराल को।

इतवारी पत्रिका के संपादक ओम थानवी की हमारी दृष्टि में ऊंची हैसियत थी।लेकिन जनसत्ता की ढलान के बंदोबस्त में इनमें से किसी से हमारे संबंध सामान्य नहीं रहे।

इन लोगों से सामान्य  संबंध भी न बन पाने का मुझे अफसोस है।

सार्वजनिक तौर पर कहना सिर्फ निजी स्वीकारोक्ति नहीं है।समीकरण साधने का की कोई जुगत भी नहीं है।दो साल के भीतर पेशेवर पत्रकारिता से विदा हो जाना है और हमारे लिए बिना छत सारे जहां को घर बनाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है।

दस साल पहले अगर हमारी हैसियत थोड़ी बेहतर हो जाती तो हम कम से कम अब तक बेघर नहीं बने रहते।अब बैकडेडटेड असमय प्रोमोशन से हमारी हैसियत में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।इस प्रतिकूल परिस्थितियों में कहीं संपादक बनकर भी हमारी औकात कुछ करने की नहीं है।

आज भी बड़ी बड़ी कारपोरेट केसरिया वारदातों की सूचनाएं हैं।ड्राइव में पहले ही अंबार लगा है, जिन्हें निपटाना बाकी है।

लेकिन इन सूचनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए मीडिया की अंतर्कथा जानना समझना बेहद जरुरी है।इसीलिए आज यह अवांछित जोखिम चर्चा।

मेरे हिसाब से संघ परिवार को हिंदू राष्ट्र के अपने एजंडा और राष्ट्रहित में तत्काल पांचजन्य और आर्गेनाइजेर जैसे मीडिया पक्ष की छंटनी कर देनी चाहिए।

अब इसकी कोई जरुरत नहीं है।

करोड़ों की रीडरशिप वाले ब्रांडेड मीडिया वाले तमाम पांचजन्य और आर्गेनाइजर की भूमिका बेहद पेशेवाराना ढंग से निपटा रहे हैं।उनका किया कराया  गुड़ गोबर ही कर रहे हैं पांचजन्य,आर्गेनाइजर और सामना जैसे अखबारात के गैर पेशेवर लोग।

आज अखबारों के संपादकीय कार्यालयों में देश दुनिया पर कोई चर्चा की गुंजाइश नहीं होती।पोस्तो प्रमोशन पैसा मुख्य सरोकार हैं।

जो कामन है वह है,राष्ट्रवादी हिदुत्व के पुरोधा गुरु गोलवलकर का अखंड पाठ।

विनम्रता पूर्वक कहना है कि विभाजन पीड़ित परिवार से हूं।मेरे पिता के अटल जी से लेकर अनेक महान संघियों से संवाद रहा है।

मेरे ताउजी भारत विभाजन के लिए कभी कांग्रेस,गांधी और नेहरु को माफ नहीं कर सकें।हमारे परिवार और बसंतीपुर गांव में वे एकमात्र प्राणी रहे हैं जो आजीवन केसरिया रहे हैं।

हमने बचपन में विभाजन के संघी कथाकार गुरुदत्त का समूचा लेखन पढ़ा है।

विभाजन की त्रासदी वाले परिवार में वाम और दक्षिण दोनों विचारधाराओं का अखंड द्वंद्व हमारा भोगा हुआ यथार्थ है और हमने अपने पिता को देखा है कि अपने बड़े भाई के विपरीत इस द्वंद्व से बाहर निकलकर विशुद्ध किसान नेता बनते हुए।

मेरे पिता  बांग्लादेश के भाषा आंदोलन में जैसे जेल गये,विभाजन से पहले तेभागा के कारण कैशोर्य में आकर दत्त पुकुर के सिनेमा हाल में टार्च दिखानेवाले की हैसियत से जैसे सर्वभारतीय शरणार्थी नेता बन गये,उसीतरह उनका कायाकल्प असम के दंगापीड़ितों के बीच साठ के दशक में हिंदू दंगा पीड़ित विभाजन विस्थापितों  के बीच काम या तराई में सिखों पंजाबियों पहाड़ियों के साथ गोलबंदी के साथ के बाद यूपी के दंगापीड़ित मुस्लिम इलाकों में भागते रहने के मध्य भी देखा।

आज बंगाल में जो शरणार्थी वोट बैंक बना है,उसकी पूंजी विभाजन त्रासदी के बदले की भावना है,जिससे हम भी सारा बचपन लहूलुहान होते रहे हैं।

बता दूं कि लाल किताब पढ़ने से पहले ही हम गुरु गोलवलकर  को पढ़ चुके थे।अपने गुरुजी से मिलने से पहले।

दिमाग में जो कबाड़ था ,वह पहले तो गुरुजी ने निर्ममता से निकाल फेंका।

बाकी रही सही कसर गिरदा शेखर राजीव लोचन नैनीताल समाचार युगमंच टीम के साथियों ने पूरी कर दी,जो शुरु से इस सांढ़ संस्कृति के विरुद्ध चिपको पृष्ठभूमि में सक्रिय थी।गिरदा के न होने के बाद भी हमारी ताकत,हमारी प्रेरणा आज भी वही नीली झील है।

अब शायद अपने मित्र जगमोहन फुटेला और अपने प्रिय वीरेनदा जैसा हश्र हामारा कभी भी हो सकता है।उनके बच्चे फिर भी प्रतिष्ठित हैं।हमारे साथ वैसी हालत भी नहीं है।

इसलिए शायद कभी भी बोलने लिखने के दायरे से बाहर निकल सकता हूं।

अमित जी के बारे में गलतफहमी बहुत देरी से दूर हो सकी।

थानवी जी के बारे में गलतफहमी दूर करने का मौका शायद फिर न मिले।

फिलहाल हम गर्व से कह सकते हैं कि कम से कम जनसत्ता अब भी केसरिया नहीं है।

बैक डोर से आये लोग क्या से क्या बन गये। लेकिन हम आईएएस जैसी कड़ी परीक्षा देने के बावजूद तजिंदगी सबएडीटर रह गये, लेकिन एडीटर बनने की लालच में जनसत्ता छोड़कर नहीं गये,आर्थिक बारी दुर्गति के मध्य मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बसंतीपुर में मेरे परिवार और मेरे गांववालों को इसकी खुशी होगी।यह मेरे लिए भारी राहत है।

मैं जैसा भी हूं,अच्छा बुरा ,सिरे से नाकाम,मेरे लोगों का प्यार मेरे साथ है और आज भी मेरा पहाड़ मेरा ही है।

हमने अपनी जनपक्षधरता की विरासत से विश्वासघात नहीं किया।

पारिवारिक संपत्ति बेचकर जैसे मैं महानागरिक नहीं बना,वैसे मैं पत्रकारिता न बेचकर कामयाब लोगों की नजर में डफर जरुर हूं।

आर्थिक मामलों को संबोधित करने में मुझे लोग बेहिसाब नक्सली माओइस्ट, राष्ट्रद्रोही, कम्युनिस्ट, घुसपैठिया वगैरह वगैरह गाली दे रहे हैं और भूल रहे हैं कि बुनियादी तौर पर मैं अपने पिता की तरह अंबेडकर अनुयायी हूं।

वे नहीं जानते कि उनके ये तमगे मेरे लिए ज्ञानपीठ और नोबेल हैं जो मैं कभी हासिल कर ही नहीं सकता।

बाकी बहुजनों,अंबेडकरियों की तुलना में फर्क सिर्फ इतना है कि जैसे आनंद तेलतुंबड़े अध भक्त नहीं हैं अंबेडकर के,मैं भी नहीं हूं।

हम दोनों साम्यवादी अवधारणाओं और अंबेडकर चिंतन व सरोकारों के मूल बुनियादी त्तवों में कोई अंतर नहीं मानते और यथासाध्य बहुसंख्य जमात को समझाने का प्रयास कर रहे हैं।

हम राष्ट्रतंत्र में बदलाव के लिए लाल नीली जमात को एकाकार करने के असंभव लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं।यही हमारी एक्टिविज्म है।मुझे खुशी है कि अरुंधती से लेकर नंदिता दास तक इस मुहिम हैं।

इसी के तहत ही आर्थिक मुद्दों पर यह फोकस।

यह न धर्मनिरपेक्षता की जुगाली है और न वाम अवसरवाद।

वाम विश्वासघात के हमसे बड़े आलोचक तो वाम श्राद्ध में सिद्धहस्त लोग भी नहीं हैं।
अशोक मित्र की तरह हम मानते हैं कि नेतृत्व भले ही नकारा हो,जैसा कि बहुजन समाज के बारे में भी प्रासंगिक है,वाम आवाम के बिना मुकम्मल बहुजन समाज बन ही नहीं सकता।

कम से कम उतना जितना फूले हरिचांद गुरुचांद, वीरसा टांट्या बील समय में रहा है।

आप हमें चूतिया बता सकते हैं बाशौक।

आप हमें ब्राह्मणों का दलाल भी बता सकते हैं बाशौक।

लेकिन यह हमारा नजरिया है और बकौल दिवंगत नरेंद्र मोहन,हम बदलेंगे नहीं।बदलना है तो आप बदलिये।जिसे घर फूंकना हो,उसे इस चूतियापे का सादर आमंत्रण।

नरेंद्र मोहन छह सालतक मेरे बास रहे हैं।मैं उनका आभारी हूं कि उन्होंने हमारे कामकाज में कभी हस्तक्षेप नहीं किया जबकि वे नख से शिख तक संघी ही थे।बिल्कुल वैसे ही जैसे 1991 से आजतक जनसत्ता में मेरी गतिविधियों पर कभी अंकुश नहीं लगा और न मेरे विचारों को नियंत्रित करने की कोई कोशिश हुई।

हमने अपने बड़े भाई  हिंदी के अनूठे उपन्यासकार व पत्रकार पंकज बिष्ट से भी फोन पर लंबी बात कर चुके हैं।वे भी मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ओम थानवी की भूमिका की तारीफ से सहमत हैं।जबकि समांतर में लगातार थानवी की आलोचना होती रही है।हम भी साहित्य अकादमी प्रसंग में उनकी भूमिका के पक्ष में नहीं थे।मालूम हो कि थानवी की नारजगी के बावजूद मेंने शुरुआत से लगातार समयांतर में लिखा है।

पंकज बिष्ट से पहाड़ों के जरिये हमारा पारिवारिक नाता है तो वैकल्पिक मीडिया के मसीहा हैं आनंद स्वरुप वर्मा।हम दुनिया छोड़ सकते हैं।कम से कम इन दो लोगों को नहीं,भले ही खुदा भी हमसे नाराज हो जायें।

रोजाना लेखन के कारण अब उनकी पत्रिकाओं मैं अनिपस्थित जरुर हूं,जैसे जनसत्ता के पन्ने पर मैं शुरु से ही अनुपस्थित हूं।लेकिन जनसत्ता तो मेरे वजूद में है।अलग से पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है।

अच्छे बुरे जनसत्ता में जितने भी लोग हैं ,रहे हैं,रहेंगे ,वे हमारे परिजन हैं।

शिकायते होंगी,झगड़े भी होंगे।लेकिन हम संघ परिवार की तरह हर हाल में एक परिवार है।इसलिए जनसत्ता में ही रिटायर होने की तमन्ना लेकर हमारे तमाम साथी जीते मरते रहे हैं।हमें उन पर गर्व है।

प्रभाष जी के जीते जी उनकी सारस्वत  भूमिका के बारे में हंस में लिखा है।मरने के बाद हमने प्रभाष जी के बारे में जोसा नहीं लिखा,रिटायर करने के बाद यदि पढ़ता लिखता रहा तो सांवादिकता प्रसंग में न लिखुंगा, न बोलुंगा।

लिखने बोलने का वक्त तो तब होता है कि जब आप उसी व्यवस्था के अंग होते हैं।

दम है तो उसके खिलाफ खड़े होकर दिखाइये।सारी सुविधाओं के भोग के बाद बिल्ली की हजयात्रा सा पाठकों दर्शकों का हाजमा खराब करने का कोई मतलब नहीं होता।

दरअसल हम लिखना चाह रहे थे कि भारतीय बहुसंख्य जनसंख्या के बहिस्कार, निष्कासन और सिलेक्टेड एथनिक क्लींजिग के लिए पतनशील सामंतों की भूमिका के बारे में,भारतीय मेधा,सूचना,ज्ञान,राजनीति और अर्थव्यवस्था समेत तमाम जीवनदायी क्षेत्रों में जो वर्ण वर्चस्वी हैं,नस्ली एकाधिकार है जिनका,उनकी भूमिका के बारे में।

लेकिन इसे समझने के लिए यह खुलासा जरुरी है कि सूचना महाविस्पोट कमसकम भारतीय प्रसंग में हीरोशिमा नागासाकी और भोपाल गैस त्रासदी से बड़ी आपदा है।

सुधारों का यह जो कार्निवाल कबंध कारवां निकला है,यह बहुसंख्य जनता को सूचना से वंचित करने के महाविनिवेश के बाद ही।अबाध पूंजी मीडिया के कोख में ही पलती पनपती है।अब जनादेश भी मीडिया की महामाया है।

ईस्ट इंडिया कंपना के खिलाफ 1957में आखिरी लड़ाई हुई।

पहली कतई नहीं।

किसान और आदिवासी विद्रोहों की कथा व्यथा और इतिहास को खारिज करके ही इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम लिखा और कहा जा सकता है।

भारत भर में तमाम किसान आदिवासी आंदोलनों का मुख्य एजंडा भूमि सुधार रहा है।अंगेजों ने इसे खारिज करने के लिए ही स्थाई बंदोबस्त लागू किया।

सामंतों ,रजवाड़ों और जमींदारों के हित जबतक साधे जाते रहे,अंग्रेजी राज से वर्णवर्चस्वी नस्ली सत्ता वर्ग को कोई दिक्कत नहीं थी।

1857 के महाविद्रोह के बारे में अब भी बांग्ला में कोई आद्यांत अध्ययन नहीं हुआ जबकि मंगल पांडेय ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उस अंतिम महाविद्रोह में पहली गोली चलायी थी।बांग्ला में चुआड़ विद्रोह का लेखा जोखा नहीं है।बौद्धसमय का वृतांत नहीं है।भारत में शूद्र आधिपात्य का इतिहास नहीं है।जो इतिहास है वह विशुद्ध गुलामी का इतिहास है।

क्योंकि नवजागरण के पहले और बाद में  तमाम मसीहा तमाम आदिवासी किसान विद्रोहकाल की तरह इस समयखंडों में भी अंग्रेजों का साथ देते रहे।

यूरोप में औद्योगिक क्रांति की वजह से औपनिवेशिक भारत में जब पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के कारण सामंतों का जलसाघर ढहने लगा तब स्वराज और रामराज का अलख जगने लगा,जो एक दूसरे के पर्याय ही हैं, तभी साम्यवाद भी आयातित हुआ।

सामंती सत्ता वर्ग के हित साधने का यह स्थाई बंदोबस्त रहा है,जिसे महात्मा ज्योतिबा फूले से लेकर गुरुचांद ठाकुर तक ने पत्रपाठ खारिज कर दिया था।

हमारे इतिहास बोध और यथार्थवाद का हाल  यह है कि जो लोग अंबेडकरी जाति उन्मूलन की भूमिका के लिए अरुंधति राय के खिलाफ तोपें दाग रहे थे,वे ही लोग ब्राह्मणी अरुंधति के गांधी के खिलाफ वर्णवादी होने के वक्तव्य को थोक दरों पर शेयर कर रहे हैं।जबकि वे अरुंधति का लिखा कुछ भी खारिज कर देने को अभ्यस्त हैं।

आजादी के बाद इसी सामंती वर्ग का वर्चस्व सत्ता पर रहा है।

आजादी के लिए बलिदान हो जाने वालों का कुनबा कौन कहां है,किस हाल में हैं,किसी को नहीं मालूम।लेकिन उनसे जो गद्दारी करते रहे, जो हमेशा अंग्रेजों का सथा देते रहे, सामंतों रजवाड़े के वे ही वंशज पूरे सात दशक से भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था के धारक वाहक रहे हैं।अब भी हैं।नाम गिनाने की दरकार नहीं है।बूझ लीजिये।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि तेल युद्ध के अमेरिकी वर्चस्व प्रस्तावना यरूशलम धर्मस्थल कब्जाने के साथ साथ भारत में बाबरी विध्वंस के साथ नत्थी है।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि तेल युद्ध के मध्य इजराइल का वह धर्म युद्ध और भारत का केसरिया पद्मप्रलय अब एकाकार है।अमेरिकापरस्त भारतीय सत्तावर्ग इजराइल का सबसे बड़ा समर्थक है जो धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण का मूलाधार है।

अब इसे भी अजीब संजोग कहिये कि स्वराज रामराज का पर्याय रहा है महात्मा समय से।अब भी है।भारत में स्वराज शुरु से ही रामराज है। इसे संघ परिवार का अवदान कहना इतिहासद्रोह है।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि धर्मोन्मादी राजनीति के तहत ही भारत महादेश का खंड खंड विखंडन हुआ।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि पहली संसद में ही आधे से ज्यादा सांसद सबसे माइक्रो माइनारिटी  के जाति के चुने गये।वह धारा अब भी मंडलपरवर्ती बहुजनवादी समय में भी अव्याहत है और इस केसरिया संसद में तो वाम फिर भी बचा,बहुजन बचा नहीं है।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि इंदिरा के समाजवादी माडल और राष्ट्रीयकरण में सबसे बड़ा धमाका प्रिवी पर्स खत्म करना था,राष्ट्रीयकरण का सिलसिला नहीं।जिससे एकमुश्त कामराज, मोराराजी, अतुल्य घोष, निजलिंगप्पा जैसे परस्परविरोधी सिंडिकेट गैर सिंडिकेट का साझा मंच इंदिरा हटाओ का बना तो उस वक्त भी उनका तरणहार देवरसी संघ परिवार था।

अब इसे अजीब संजोग कहिये कि रजवाड़ों और सामंतों का पूरा दल बल गांधीवाद का आसरा छोड़कर इंदिरा समय में ही उस बनिया पार्टी में समाहित हो गया,जो प्रिवी पर्स खत्म करने वाली इंदिरा गांधी को दुर्गा अवतार कहकर मौलिक धर्मोन्माद का रसायन तैयार कर रही थी बांग्लादेश के नक्सल दमन समय में।

यह भी अजीब संजोग है कि हरित क्रांति की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीयकरण आंधी के तुंरत बाद आपरेशन ब्लू स्टार से ही सूचना क्रांति की सुनामी बनने लगी थी, जिसे संघ परिवार के बिना शर्त समर्थन से इंदिरा अवसान पर राजीव के राज्याभिषेक सिखों के नरसंहार मध्ये होने का बाद सैम अभिभावकत्व में खिलखिलाने का मौका मिला।

इसे भी अजब संजोग कहिये कि संपूर्ण क्रांति के बहाने नक्सली जनविद्रोह के समय ही सातवां नौसैनिक बेड़े की हिंद महासागर में उपस्थिति और दियागोगार्सिया परिघटना के मध्य बारत में संपूर्ण क्रांति के जर्ये जिस गैर कांग्रेसवाद का जन्म हुआ,अमेरिका परस्त उसका केसरिया कारपोरेट तार्किकि परिणति आज का यह पद्मपुराण है।

यह भी अजीब संजोग है कि 1857 में और उसके पहले के पूरे सौ साल के ईस्ट इंडिया कंपनी राज के वक्त अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीय महामहिम मनीषियों की या तो  जुबान बंद रही है, या फिर विक्टोरिया वंदना में खुलती रही है,ठीक उसीतरह आजादी के बाद लगातार और खासकर 1970 और 1980 के संक्रमणकाल मध्ये भारतीय मनीषी बोले बहुत हैं,कहा कुछ भी नहीं।यही बजट परंपरा भी है।

यही रघुकुल रीति अखंड 1991 से जारी है।

मौनता के अवतारों अवतारियों का सुसमय है।

और वाचाल मुखर लोगों के लिए चार्वाक वाल्तेयर दुर्गति नियतिबद्ध कर्मफल दुर्भोग है।

इस वैदिकी समय में लेकिन चार्वाक और वाल्तेयर सबसे जरुरी है,शास्त्रीय संगीत,व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र नहीं।

नहीं नहीं नहीं।

अब समझ लें कि शेष समय अकस्मात अप्रत्याशित ढंग से उन ओम थानवी की तारीफ क्यों कर रहा हूं जबकि उनके साथ मेरे न मधुर संबंध कभी रहे हैं और न भविष्य में कभी हो सकते हैं।

परख करना चाहें तो आपरेशन ब्लू स्टार समय में जनसत्ता और नभाटा की फाइलें पलट कर देख लें।तबके संपादकीय देख लें।

दरअसल ओम थानवी की तारीफ किये बिना ,गोलवलकर केसरिया अखंड पाठ के मीडिया समय में जनसत्ता की फिलवक्त भूमिका की चर्चा किये बिना कमसकम भाषाई पेड मीडिया भूमिका के परिप्रेक्ष्य में लापता सूचनाओं की तलाश असंभव है वरना कयामत के वक्त खाक मुसलमां होना।

आज का केसरिया कारपोरेट समय कुल मिलाकर बहुसंख्य जनता की नागरिकता और संसाधनों पर उनके स्वामित्व को खारिज करने के मकसद से सामंती राष्ट्रद्रोही तत्वों का अंतिम शरण स्थल है।

ध्यान रहें कि मैं अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी साहित्य का छात्र रहा हूं हालांकि लिखता हिंदी और बांग्ला में हूं।अंग्रेजी में लेखन तकनीकी मजबूरी है।कुछ अस्पृश्य भौगोलिक हिस्सों को संबोधित करने के लिए अंग्रेजी माध्यम जरुरी भी है।

बतौर माध्यम मैं सक्षम होता तो तमिल, कन्नड़, गोंड, मलयालम, तेलुगु, असमिया, गुरमुखी, उर्दू, संथाली, मणिपुरी,भोजपुरी,मैथिली,मराठी,गुजराती,ओड़िया,कोंकणी समेत सभी भारतीय भाषाओं में लिखता बोलता।

सिर्फ संस्कृत के सिवाय।

क्योंकि मूलतः इस जाति व्यवस्था में मैं अस्पृश्य संतान हूं और द्विज नहीं हो सकता। देवभाषा पर असुर वंशज का अधिकार असंभव है।लेकिन मजा तो यह है कि संस्कृत भाषा में वह मजा है जो पाली और प्राकृत में नहीं है।

आज इस मानसूनी सूचना परिदृश्य पर कोई ताजा सूचना टांक नहीं रहा हूं।क्योंकि उन सूचनाओं को समझने की दृष्टि के लिए इन बुनियादी बातो पर बहस होनी चाहिए।

बुनियादी तौर पर मैं एक मामूली पत्रकार हूं।

मेरे इतिहास बोध और मेरे लोक अर्थ शास्त्र पर विवाद की गुंजाइश बहुत होगी।जिनको कहना है,कहें।

दुरुस्त कर दें मेरा हिसाब किताब।जो मेरे हर पोस्ट पर ट्रेटर,कम्म्यु टांकते रहते हैं,चाहे तो वे भी तथ्यों को दुरुस्त कर सकते हैं।

आगे भूमि सुधार,खनन,पर्यावरण,बीमा,श्रम,बैंकिंग,रेलवे,संचार,बंदरगाह,ऊर्जा तमाम जरुरी सेक्टरों और सेवाओं पर, उत्पादन प्रणाली और नस्ली भेदभाव पर फोकस रहेगा। तब तक जबतक मुझे छाप रहे हस्तक्षेप का धीरज टूट न जाये।जिस शख्स को उसे अपने ब्लैक लिस्ट किये हुए है,उसे रोजाना छापते रहने के लिए ब्राह्मण अमलेंदु का आभार।

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

भूमि अधिग्रहण कानून सिरे से बदलने की तैयारी वाम पहल माध्यमे,राजनीतिक सहमति से

भूमि अधिग्रहण कानून सिरे से बदलने की तैयारी वाम पहल माध्यमे,राजनीतिक सहमति से
पलाश विश्वास
हमने पहले भी लिखा है कि राजनीति जनता के खिलाफ लामबंद हो गयी है।मामूली पत्रकार हूं।इसलिए भाषा में तौल बराबर नहीं है।यह लामबंदी नहीं है।लामबंदी तो जनता की और पीड़ित पक्षों की हो सकती है,सत्ता पक्ष को लामबंदी की जरुरत नहीं होती क्योंकि वह दमनकारी है,उत्पीड़क और विध्वंसक भी।राजनीति दरअसल अपराधकर्मियों की तरह फिलवक्त गिरोहबंद हैं जनता के खिलाफ।जो राज्यतंत्र है और जो जनप्रतिनिधित्व का जलवा है,जो मुक्तबाजारी नवधनाढ्य मुक्तबाजारी सांढ़ संस्कृति है,उसमें आम आदमी का मारा जाना तय है चाहे हत्यारे के मुखौटे का रंग कुछ भी हो।

जैसा कि दस्तूर भी है,जैसा नागरिकता संविधान संशोधन कानून के वक्त हुआ,जैसा बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता के लिए हुआ, जैसा अबाध निरंकुश मुक्त बाजार के हितों के मुताबिक होता है बार बार,कारपरेट चंदा से चलने वाली राजनीति पारस्पारिक दोषारोपण और बेमिसाल नूरा कुश्ती के मध्य असंभव सहयोग के साथ भूमि अधिग्रहण कानून से लेकर श्रम ,खनन,पर्यावरण कानून और तमाम वित्तीय सुधार को अंजाम देने वाली है जनता के साथ विश्वासघात की अटूट परंपरा का निर्वाह करते हुए।

ताजा खबर है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सीमा बढाकर 49 प्रतिशत करने को आज मंजूरी दे दी लेकिन इसमें शर्त रखी गई है कि इनका प्रबंध नियंत्रण भारतीय प्रवर्तकों के हाथ में बना रहेगा। सरकार के इस कदम से बीमा क्षेत्र में 25000 करोड़ रुपये का विदेश निवेश मिल सकता है। बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा को 26 प्रतिशत से बढाकर 49 प्रतिशत करने का प्रस्ताव 2008 से ही लंबित था। इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने से दीर्घकालिक पूंजी आने तथा कुल निवेश माहौल में सुधार की उम्मीद की जा रही है।

रिजर्व बैंक की ओर से इस बार सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए उप सीमा को पांच अरब डॉलर बढ़ा दिया गया है। यह उप सीमा तीस अरब डॉलर थी। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों को आकर्षण करने में आसानी होगी और विदेशी पूंजी में बढ़ोतरी होगी। आपको बता दें कि जब से केंद्र सरकार में भाजपा आई है तभी से विदेशी निवेश को आकर्षित करने के प्रयास तेज हो गए हैं। भाजपा का विदेशी निवेश आकर्षित करने की ओर अधिक ध्यान है। आपको बता दें कि इससे पहले रेलवे व इंश्योरेंस में भी विदेशी निवेश को लेकर भाजपा बात आगे बढ़ा चुकी है।

ताजा खबर यह भी है कि कारोबार के अंतिम घंटे में विदेशी कोषों की जोरदार लिवाली से बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 125 अंक चढ़कर 26,271.85 अंक के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह लगातार आठवां सत्र रहा जबकि सेंसेक्स में तेजी आई है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ऊंचा विदेशी निवेश आकर्षित करने के प्रयासों से निवेशकों में काफी उत्साह है। इसके अलावा कई बड़ी कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों और चीन के आर्थिक आंकड़ों के चलते सकारात्मक वैश्विक रुख के बीच घरेलू धारणा को बल मिला।

नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछली संप्रग सरकार के समय बनाये गये महत्वाकांक्षी भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का संकेत देते हुए बुधवार को कहा कि वर्तमान कानून के चलते भूमि अधिग्रहण में बहुत समय लगेगा जिससे विकास कार्य प्रभावित होंगे। सड़क, राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के नियंत्राणाधीन अनुदान की मांगों पर  कहा कि अगले दो साल में प्रतिदिन औसतन 30 किमी राष्ट्रीय राजमार्गों निर्माण होगा। गडकरी ने कहा, 80 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण के बिना किसी राजमार्ग परियोजना के लिए निविदा नहीं निकाली जायेगी। उन्होंने कहा कि यह कदम बुनियादी ढांचा विकास को तेज करने के लिए उठाया गया है। सरकार सभी मंजूरियोंवाली 300 परियोजनाओं का भंडार तैयार करना चाहती है। उन्होंने फिक्की द्वारा आयोजित पीपीपी शिखर सम्मेलन में यह जानकारी दी।

केसरिया कमल ब्रिगेड जो हा सो है,लेरकिन धर्म निरपेक्ष गैरकमलीय राज्यों की जो सरकारे हैं,उनकी पार्टियां कुछ कहें,लेकिन सुधारों के मामले में वे केंद्र का चोली दामन साथ निभा रहे हैं।

डायरेक्ट टैक्स कोड,जीएसटी और सब्सिडी के साथ साथ एफडीआई और विनिवेश के हर संगीत कार्यक्रम में यह शास्त्रीय युगलबंदी दिख रही है।

मसलन दावा है कि भूमि सुधार कानून संशोधन  राहुल गांधी का ड्रीम रहा है जैसी की यूपीए की तमाम योजनाएं नेहरु गांध वंश से नत्थी है।

अब इसका क्या कहें कि वामपक्ष की एकमात्र बची खुची सरकार त्रिपुरा की युगल बंदी गुजरात सरकार के साथ है,जिनकी पहल पर भूमि अधिग्रहण  संशोधन कारपोरेटउपक्रम है। इसपर तुर्रा यह कि राहुल गांधी के ड्रीम कानून भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन के मुद्दे पर राजग सरकार को कांग्रेस शासित राज्यों की सुझावों के जरिए सहमति मिल गयी है।इसी बीच भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर रही केंद्र सरकार से गुजरात व त्रिपुरा ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के बनाए इस कानून को ही रद्दी की टोकरी में डालने और नया कानून बनाने को कहा है।


संसद में बजट और रेल बजट पेश हुए लगभग एक पखवाड़ा बीतने चला।संसद और संसद के बाहर हद से हद मूल्यवृद्धि पर चर्चा हो रही है।आर्थिक सुधारों के खिलाफ इसी एक पखवाड़े तो क्या पूरे तेईस साल से इस देश में खामोशी पसरा हुआ है।जनगण को विकास कामसूत्र का पाठ देकर राजनीति का अनंत एटीएम चालू है।बजट सत्र है संसद का लेकिन सरकार की आर्थिक नीतियों पर कोई बहस हुई नहीं है।बजट पर चर्चा महज रस्म अदायगी है जिसमें दिशा पूछी जा रही है और सत्याच्युत पक्ष अपने समय की चाशनी पेश करने में लगा है।

यह वह परिवेश है,वह निम्नदबाव क्षेत्र है,जिसमें सुनामी के इंगित हैं।संसद और संविधान को पबायपास करके यहां तक कि मंत्रिमंडल तक की मंजूरी लिये बिना परिपत्र और शासनादेश के तहत एक के बाद एक सुधार लागू हो रहे हैं।मीडिया और कारपोरेट का समवेत हताशा के शोर से जनता को गलतफहमी हो गयी है कि केसरिया कारपोरेट सरकार शायद पूरी तरह बिजनेस फ्रेंडली नहीं है और शायद उसकी भी कुछ राजनीतिक बाध्यताएं हैं।भाषाई और अंग्रेजी मीडिया में सुधारों के गतिवेग से हड़कंप मचा हुआ है।

लोकिन विदेशी निवेशकों की अटल आस्था और सांढ़ संस्कृति की निरंकुशता पर गौर करें तो असलियत की कलई खुल जायेगी कि गला रेंतना जारी है लेकिन किसी को दर्द का तनिक अहसास नहीं है।

तेईस साल में ज्यादातर वक्त अल्पमत सरकारें सत्ता में रही हैं और नीतियों की निरंतरता जनसंहार सांढ़ संस्कृति की ही रही है।

जनता की आंखें अजीब प्रिज्म हैं जिसमें सत्ता इंद्रधनुष के सारे रंग अलग अलग दिखते हैं जो हकीकत में एक ही है।


केसरिया कारपोरेट सरकार के सत्ता में आते ही कारपोरेट लाबिइंग का सारेगामा भूमि अधिग्रहण कानून को खत्म करने का अलाप है।दलील यह है कि केंद्र सरकार को पिछले साल संप्रग सरकार द्वारा लागू भूमि अधिग्रहण कानून को निरस्त कर देना चाहिए और उसके बदले एक नया कानून लाना चाहिए ताकि सड़क, बंदरगाह और हवाई अड्डा जैसी बड़ी परियोजनाओं में वर्षों की देरी से बचा जा सके।इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एनडीए सरकार ने यूपीए सरकार के बहुचर्चित भूमि आधिग्रहण कानून में खासा बदलाव करने की योजना बनाई है। इसके लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मौजूदाकानून में तमाम चेंज करने का प्रस्ताव तैयार किया है।

बजट सत्र में पेश होने वाले भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक का आधार वे 19 सुझाव हैं जो राजस्व मंत्रियों के सम्मेलन में मिले थे। इन सुझावों को प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा जा चुका है। इनमें एक सुझाव पीपीपी परियोजनाओं में 80 फीसद भू स्वामियों की सहमति को घटाकर 50 फीसद करने का है। एक अन्य सुझाव सामाजिक प्रभाव के आकलन संबंधी प्रावधान को केवल बड़ी परियोजनाओं पर ही लागू करने का है। दिल्ली, गोवा, हिमाचल और उत्तराखंड को बहुफसली भूमि के अधिग्रहण पर इतनी ही जमीन को खेती लायक बनाने वाले प्रावधान पर आपत्ति है। इन राज्यों का कहना है कि उनके यहां इस प्रावधान पर अमल संभव नहीं। कुछ राज्यों ने कानून के पिछली अवधि से लागू करने पर भी आपत्ति जाहिर की है। कई राज्यों ने कुछ प्रावधानों को और सख्त बनाने की भी बात कही है।

केंद्रीय भूतल परिवहन राजमार्ग व ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी ने कांग्रेस की मुश्किलों को बढ़ाते हुए कहा है कि संशोधन में कांग्रेस शासित राज्यों के सुझावों को प्राथमिकता दी जाएगी। गौरतलब है कि हरियाणा, असम, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्यों ने कानून में संशोधन पर अपने सुझाव देकर सरकार की इस मुहिम को मौन समर्थन दे दिया है।

भूमि अधिग्रहण का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है. नोएडा से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के जबरदस्त आंदोलन हुए हैं।वित्त व प्रतिरक्षा मंत्री मशहूर कारपोरेट वकील  अरुण जेटली ने भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में कह दिया है कि  कि किसानों को उनकी जमीन का उचित दाम मिले लेकिन कानून ऐसा भी न हो कि अधिग्रहण संभव ही न हो सके।

खास सुझाव
जमीन अधिग्रहण के लिए प्रभावित भू स्वामियों में से 80 फीसदी की सहमति के प्रावधान को लचीला कर इसे 50 फीसदी तक रखा जाए।

सामाजिक प्रभाव आंकलन का प्रावधान को समाप्त किया जाए। यह परियोजनाओं में नाहक देरी का सबब बन सकता है।

अधिग्रहण के बाद जमीन का उपयोग न किये जाने पर जमीन भू स्वामी को वापस किये जाने संबंधी प्रावधान को खत्म किया जाए।

जमीन के बदले जमीन संबंधी प्रावधान पर भी पुनर्विचार हो।

वर्तमान कानून में 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की मंजूरी के बाद ही अधिग्रहण किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह है कि बागी किसानों को छोड़कर अन्य सब सहमत हों तभी जबरन अधिग्रहण करना चाहिए। इस प्रावधान को नरम बनाकर अब केवल 51 प्रतिशत की सहमति बनाने पर विचार किया जा रहा है। जन सुनवाई तथा सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रपट को भी समाप्त करने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान कानून में 'प्रभावितों' में खेत मजदूर तथा बटाईदार सम्मलित हैं, लेकिन अब केवल किसान को प्रभावित मानने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान में कृषि भूमि के अधिग्रहण के लिए सरकार को सर्टिफिकेट देना होता है कि बंजर भूमि उपलब्ध नहीं है। इसे हटाने पर विचार किया जा रहा है। इन संशोधनों से भूमि अधिग्रहण तेजी से हो सकेगा और बड़े प्रोजेक्टों को शीघ्र क्रियान्वित किया जा सकेगा।

देश में अनेक स्थानों पर औद्योगिक एवं रिहायशी परियोजनाओं के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण को लेकर अक्सर विवाद पैदा होते रहे हैं। सिंगूर में टाटा कम्पनी का प्लांट हो या फिर नोएडा एक्सटैंशन में निर्माण को लेकर विवाद, हर बार यही बात उठती रही है कि देश में भूमि अधिग्रहण को लेकर कोई कारगर कानून नहीं है।
इसी के चलते नए भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर सरकार पर काफी दबाव था जिसे गत दिनों ही लोकसभा की मंजूरी मिली है। सरकार का कहना है कि इस कानून के तहत अब किसानों को उनकी जमीन की सही कीमत मिलेगी लेकिन विपक्ष को अभी भी कुछ बातों पर ऐतराज है।

भूमि स्वामियों को लाभ
नए भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार गांवों में अधिग्रहण की गई जमीन के बदले बाजार भाव का 4 गुना मुआवजा जबकि शहरों में 2 गुना मुआवजा मिलेगा। वहीं निजी कम्पनियों के लिए भूमि अधिग्रहण हेतु 80 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी जरूरी होगी जबकि पब्लिक प्राइवेट प्रोजैक्ट्स के लिए 70 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी चाहिए। सरकारी प्रोजैक्ट के लिए किसी की भी मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। पूरी रकम अदा किए जाने तक जमीन मालिकों को नहीं हटाया जाएगा।

खास बात है कि जो अधिग्रहण पूरे नहीं हुए हैं उन पर भी अब मुआवजा नए कानून के हिसाब से मिलेगा। अगर 5 साल में परियोजना शुरू नहीं होती है तो अधिग्रहण खारिज हो जाएगा।

इंडस्ट्री की आशंकाएं
इंडस्ट्री यह तो मान रही है कि इससे किसानों को उनकी जमीन का सही हक मिलेगा लेकिन साथ में यह भी कह रही है कि इससे परियोजनाओं की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। अगर रियल एस्टेट की बात करें तो इस कानून के तहत अधिग्रहित भूमि पर बने मकानों का महंगा होना लगभग तय होगा। वहीं जानकारों का मानना है कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के बाद परियोजनाओं के पूरा होने में लगने वाला वक्त भी बढ़ेगा और जमीन की कीमतों में तो बढ़ौतरी होगी ही। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार को इस सैक्टर को राहत पहुंचाने के लिए अन्य प्रकार की रियायतें देने के बारे में सोचना होगा ताकि घरों की कीमतों में ज्यादा बढ़ौतरी न हो।

भारतीय किसान यूनियन ने केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के खिलाफ आंदोलन छेडऩे का फैसला किया है।

भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल ने चंडीगढ़ में बताया कि ‘अच्छे दिन’ की बजाय लगता है किसानों के बुरे दिन शुरू हो गये हैं। राजेवाल ने कहा, ‘ मोदी सरकार की नीतियां किसान विरोधी हैं। केंद्र ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य मात्र 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया है वहीं दूसरी तरफ उसने डीज़ल के भाव बढ़ा दिये। हाल के दिनों में खेतीबाड़ी में काम आने वाले वस्तुओं के दाम भी बढ़ गये हैं। आलू जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी गयी है।’ किसान नेता ने कहा कि भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव लाने की जल्दी में है ताकि किसानों की जमीन अधिगृहित करने में उद्योगपतियों को कोई दिक्कत न हो।

राजेवाल ने कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ लडऩे को भाकियू तैयार हो चुकी है। हम दिल्ली में धरने देंगे परंतु उससे पहले भाजपा की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लिए प्रदेश में मुहिम चलायेंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने भी चुप्पी साध ली है। ‘हम इस चुप्पी का कारण जानने शीघ्र ही प्रकाश सिंह बादल से मिलेंगे।’ उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में नशों की उपलब्धता न होने पर नशेडिय़ों ने अब भांग का सहारा लेना शुरू कर दिया है। भाकियू ने ग्रामीण क्षेत्रों में भांग के पौधे उखाडऩे का फैसला किया है।


इसीतरह देवरिया में गन्ना किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय ने भूमि अधिग्रहण कानून २०१३ में संशोधन के केंद्र सरकार के बयान की पुरजोर शब्दों में निंदा की है और कहा है की मोदी सरकार चुनावों में मिली पूंजीपतियों की मदद का एहसान चुकाने के लिए ऐसा करने जा रही है। इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन किया जाएगा।


ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से राज्यों के राजस्व मंत्रियों की एक बैठक दिल्ली में बुलाई गई थी, जिसमें कई राज्यों ने भूमि अधिग्रहण कानून के कुछ प्रावधानों का विरोध किया है और इसमें बदलाव की मांग की है। असल में यह विरोध नई सरकार के आने के समय ही शुरू हो गया था। केंद्र सरकार खुद ही इसमें बदलाव चाह रही थी। तभी ग्रामीण विकास के साथ-साथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय संभाल रहे नितिन गडकरी ने कहा था कि सड़क बनाने के लिए इस कानून में कुछ बदलाव की जरूरत होगी। भाजपा शासित राज्यों ने उसी बात को आगे बढ़ाया है।

हैरानी की बात है कि कांग्रेस शासित कुछ राज्यों ने भी इसमें बदलाव की मांग की है, जबकि कांग्रेस ने बदलाव का विरोध करने का फैसला किया है। इसकी वजह ये है कि इस बिल को राहुल गांधी का ड्रीम बिल माना जाता है। सो, अब इस बिल के विरोध को लेकर संशय पैदा हो गया है।

माना जा रहा है कि अब सिर्फ वे ही राज्य इसका विरोध करेंगे, जिनके यहां इस साल के अंत में चुनाव होने वाला है। प्रादेशिक क्षत्रप जरूर इसका विरोध करेंगे। उनको अपने यहां बड़ी कंपनियों और कारोबारियों के हितों से ज्यादा अपने यहां के किसानों के वोट का ध्यान रखना है। अगर केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की सोचती है तो जिन राज्यों में चुनाव होने वाला है वहां के कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेता इसका विरोध कर सकते हैं। महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा जैसे राज्यों में इसका विरोध हो सकता है। बाकी राज्यों में सरकार की पहल को मौन या मुखर समर्थन मिल सकता है।

अटल संदेश के अनुसार  राहुल गांधी के ड्रीम कानून भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन के मुद्दे पर राजग सरकार को कांग्रेस शासित राज्यों की सुझावों के जरिए मिली सहमति के कारण इन राज्य सरकारों और पार्टी नेतृत्व में खींचतान की स्थिति पैदा हो गई है। अपने राज्यों के रुख से इस मुद्दे पर सरकार से तकरार की तैयारी कर रहे कांग्रेस नेतृत्व को तगड़ा झटका लगा है और पार्टी बैकफुट पर नजर आ रही है। राजग सरकार ने विकास को गति देने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की तैयारी तेज कर दी है। इस उठापटक के बीच कांग्रेस ने सरकार पर कॉरपोरेट घरानों के दबाव में होने का आरोप लगाया है। साथ ही पार्टी आलाकमान ने कांग्रेस शासित राज्यों को मनाने का जिम्मा जयराम रमेश के कंधों पर डाल दिया है।

निजाम बदलने के साथ देश के विकास को गति देने के प्रयास में केंद्र ने संप्रग सरकार द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की कवायद शुरू कर दी है। देश में औद्योगिक विकास को प्राथमिकता देने और बजट में देश भर में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा कर चुकी भाजपा नीत राजग सरकार को लगता है कि भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान इसमें अड़चन पैदा कर सकते हैं। लिहाजा, सरकार ने पहल करते हुए राज्यों से इस कानून में बदलाव के लिए सुझाव मांगे थे। राहुल गांधी के ड्रीम कानून में बदलाव लाने के सरकार के कदम से तिलमिलाई कांग्रेस ने भाजपा पर किसानों के हितों की उपेक्षा का आरोप लगाया। हालांकि अब स्वशासित राज्यों के बदलाव के समर्थन में आने से कांग्रेस पसोपेश में है।

सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस शासित राज्यों ने पार्टी आलाकमान को कहा है कि कानून के प्रावधानों के कारण उनके राज्यों में ढांचागत निवेश में कमी आ रही है। ऐसे में पार्टी को संशोधनों को लेकर कड़ा रुख नही अपनाना चाहिए। इस मामले को लेकर बेहद गंभीर आलाकमान ने संकेत दिए हैं कि पार्टी इस पर संसद से सड़क तक अभियान चलाएगी। हालांकि, राज्यों के इस रुख को देखते हुए आलाकमान ने एक बार फिर इस मामले की जिम्मेदारी कानून को पारित कराने में अहम भूमिका निभा चुके जयराम रमेश पर डाल दी है।

जयराम के कंधों पर पार्टी शासित राज्यों को इस मुद्दे पर रणनीतिक चुप्पी साधने के लिए मनाने और विपक्ष को एक करने की जिम्मेदारी है। गौरतलब है कि जयराम कानून में संशोधन की सरकार की कवायद का जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। इसके उलट राजग सरकार कांग्रेस शासित राज्यों से सकारात्मक समर्थन आने के बाद उत्साहित है।

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल और त्रिपुरा के वित्त व राजस्व मंत्री बाबुल चौधरी ने केंद्र सरकार से कहा है कि भूमि अधिग्रहण व पुनर्वास विधेयक 2013 में बुनियादी खामियां हैं, इसलिए इसकी जगह दूसरा कानून लाया जाना चाहिए।

पटेल की राय पिछले माह ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी की ओर से बुलाई गई बैठक में गुजरात के प्रतिनिधि ने रखी थी। जबकि त्रिपुरा के वित्त मंत्री ने गडकरी को पत्र लिखकर इस कानून को बदलने का सुझाव दिया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 27 जून को राज्यों के साथ इस मसले पर बैठक की थी। बैठक में मिले सुझवों के आधार पर गडकरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। उन्होंने मौजूदा कानून में 19 संशोधन सुझाए हैं। इस बैठक में कानून के करीब दो दर्जन प्रावधानों पर चर्चा की गई थी।

सरकार में सूत्रों के अनुसार, गुजरात व त्रिपुरा की सिफारिश के बावजूद फिलहाल कानून को रद्दी की टोकरी में डालना संभव नहीं है। लेकिन जिन प्रावधानों पर राज्यों को ज्यादा आपत्ति है उन्हें बदला जाएगा। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात व महाराष्ट्र जसे बड़े राज्यों सहित ज्यादातर राज्यों की आपत्ति पीपीपी के तहत बनने वाली परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण से पहले 70 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी आवश्यक बनाने को लेकर है।

राज्यों की दूसरी प्रमुख आपत्ति परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण से पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव के अध्ययन से संबंधित है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने इस प्रावधान को ही समाप्त करने की सिफारिश की है।

सूत्रों के अनुसार, गडकरी का इरादा संशोधित कानून को संसद के इसी सत्र में पेश करने का है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने 26 मई को शपथ ली थी और इस सप्ताह के अंत तक सरकार का दो महीने का कार्यकाल पूरा हो जाएगा।मोदी सरकार ने अभी तक जो महत्त्वपूर्ण फैसले किए हैं, उनमें 10 जुलाई को वित्त वर्ष 2014-15 के लिए पेश किया गया बजट भी है। जो लोग यह मानकर बैठे थे कि भाजपा सरकार केंद्र में आते ही संप्रग सरकार द्वारा पिछले 10 वर्ष के दौरान किए गए सभी फैसलों को खारिज कर देगी उन्हें बड़ा झटका लगा है। पूर्ववर्ती संप्रग सरकार द्वारा शुरू की गई एक भी प्रमुख योजना को खारिज नहीं किया गया है। बल्कि उन्हें जारी रखा गया है और पर्याप्त रकम भी आवंटित की गई है।महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को इस साल जारी रखा गया है और उसे पर्याप्त रकम भी दी गई है। और नए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का हाल भी यही है और दिलचस्प है कि चालू वित्त वर्ष के लिए खाद्य सब्सिडी बिल 25 फीसदी बढ़कर 1.2 लाख करोड़ होने की प्रमुख वजह भी यही थी। यही नहीं गरीबों को नकद सब्सिडी और पहचान मुहैया कराने के उद्देश्य से शुरू की गई आधार योजना को भी मोदी सरकार ने नया जीवनदान दिया है।

सरकार इस साल दीवाली पर विनिवेश योजना को रफ्तार देने की तैयारी में जुटी है। इसके तहत अक्टूबर में सेल की 5 फीसदी हिस्सेदारी बेची जाएगी और बाद में कोल इंडिया के 10 फीसदी शेयर बेच दिए जाएंगे। विनिवेश विभाग ने करीब दर्जन भर कंपनियां छांटी हैं, जिनकी हिस्सेदारी इस साल बेची जा सकती है। अक्टूबर से शुरू हो रहे विनिवेश कार्यक्रम के तहत हर महीने दो कंपनियों के निर्गम लाए जा सकते हैं ताकि इस साल विनिवेश के जरिये 58,425 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य पूरा हो सके।
कोल इंडिया सरकार का सबसे बड़ा निर्गम होगा, जिसमें मौजूदा शेयर भाव के मुताबिक 10 फीसदी विनिवेश से सरकार को करीब 24,258 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। सेल 1,800 करोड़ रुपये दिला सकती है। वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, 'अक्टूबर तक एक-दो बड़े निर्गम आ सकते हैं। सबसे पहले सेल आएगी फिर कोल इंडिया आएगी।' इन दोनों के बाद पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन, आरईसी, टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (टीएचडीसी) और एसजेवीएन का विनिवेश हो सकता है। बाद में एनएचपीसी, कॉनकॉर, एमएमटीसी, एनएलसी और मॉयल प्रमुख हैं। ज्यादातर विनिवेश ओएफएस के जरिये किया जाएगा, लेकिन टीएचडीसी, एचएएल और आरआईएनएल के आईपीओ आएंगे।

ओएनजीसी में विनिवेश से भी सरकार को 17,329 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। लेकिन इसमें कुछ वक्त लग सकता है क्योंकि कंपनी ने विनिवेश से पहले सरकार से कुछ मसले सुलझाने के लिए कहा है। अधिकारी ने बताया कि कोल इंडिया के सभी मसले सुलझ गए हैं और ओनएनजीसी का भी समाधान हो जाएगा। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा शेयर भाव के मुताबिक दोनों कंपनियों से सरकार को 35,000 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं मिल सकेंगे। उन्होंने बताया कि इनमें से कई कंपनियों में हिस्सा बेचने के लिए के लिए कैबिनेट प्रस्ताव पहले ही भेजा जा चुका है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति से इसकी मंजूरी मिलते ही निवेशकों को लुभाने के लिए रोड शो शुरू किए जा सकते हैं।

इन कंपनियों में विनिवेश से सरकार को करीब 36,925 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। ङ्क्षहदुस्तान जिंक और बाल्को में बाकी सरकारी हिस्सेदारी बेचकर 15,000 करोड़ रुपये और सूटी का हिस्सा बेचकर 6,500 करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव किया है। अगर 2014-15 में विनिवेश अक्टूबर में शुरू होगा तो सरकार को हर माह औसतन 9,737 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। हालांकि इस बात की आशंका जताई जा रही है दूसरी छमाही में निर्गमों की बाढ़ सकती है लेकिल मंत्रालय दो निर्गम के बीच खासा समय रखने की कोशिश कर सकता है। सरकार खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ छूट की पेशकश भी कर सकती है। पिछले साल सरकार विनिवेश के जरिये 25,841 करोड़ रुपये जुटा पाई थी जबकि लक्ष्य 55,814 करोड़ रुपये का था।





बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक  फैसलों और नीतिगत पहल को चरितार्थ करने का कोई स्पष्टï खाका नहीं दिख रहा है। लेकिन इसका गौर से अध्ययन करने पर पता चलेगा कि वृहद नीति के दो संकेत ऐसे हैं, जिनसे यह समझने में मदद मिल सकती है कि मोदी सरकार किस स्तर पर सोच रही है और आने वाले दिन में वह अपने प्रशासन के एजेंडे को कैसा आकार देगी। पहली, बड़े और व्यापक सुधार करने में सरकार की झिझक। मोदी सरकार से यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि वह कामकाज संभालने के कुछ दिनों के भीतर ही बड़े आर्थिक सुधारों पर आगे बढ़ेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मोदी सरकार ने दो महीने में क्या किया और नरसिंह राव सरकार ने शुरुआती दो महीने में जो काम किया था उसकी तुलना करेंगे तो जमीन-आसमान का अंतर दिखेगा।

वर्ष1991 में मनमोहन सिंह ने जो बजट पेश किया उसमें उन्होंने आर्थिक नीति में बदलाव किए और औद्योगिक नीति को उदार बनाकर देश के आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल डाला। मोदी सरकार से भी भूमि अधिग्रहण कानून, सब्सिडी व्यवस्था और  श्रम नीति में बदलाव करने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अभी तक इनमें से किसी पर भी सरकार ने कुछ नहीं किया है, हालांकि भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ बदलाव के सुझाव मिले हैं और माना जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक नया व्यय सुधार आयोग सब्सिडी व्यवस्था को लेकर भी सिफारिशें सौंप देगा।

बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक  लेकिन शायद नरसिंह राव सरकार के साथ मोदी सरकार की तुलना करना सही नहीं है। 1991 में सरकार के सामने गंभीर आर्थिक संकट था और उसके पास ऐसे सख्त सुधार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। इसके उलट अभी अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है। यह अलग बात है कि इसके समक्ष मौजूद चुनौतियां काफी मुश्किल हैं और अगर उन्हें नजरअंदाज किया गया तो समस्या बहुत गंभीर हो सकती है। इसके बावजूद यह तर्क दिया जा सकता है कि जिस संकट से पार पाने के राव सरकार ने कड़े कदम उठाए थे वैसा संकट मोदी सरकार के सामने नहीं है।





डॉ. भरत झुनझुनवाला ने दैनिक जागरण में लिखा है कि संभवत: राजग सरकार को चीन का मॉडल दिखता है। भूमि अधिग्रहण आसान होने से वहां बड़े प्रोजेक्टों को लागू करना आसान है। चीन में कृषि भूमि पर किसानों का मालिकाना हक होता है। इस भूमि को पहले स्थानीय सरकार अधिग्रहित करती है फिर किसानों के साथ वार्ता करके भूमि का मूल्य तय किया जाता है। कम से कम बाजार भाव के बराबर मूल्य दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर बाजार भाव से 40 प्रतिशत अधिक भी दिया जाता है। इसके बाद सरकार द्वारा भूमि की नीलामी की जाती है। भूमि को दस गुना मूल्य तक बेचा जाता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय सरकारें भारी लाभ कमाती हैं। इन सरकारों पर कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों का वर्चस्व होता है। अधिग्रहण के विरोध में किसानों के पास कानूनी संरक्षण शून्यप्राय हैं। असंतुष्ट होने पर किसान अदालत नहीं जा सकते।

झुनझुनवाला के मुताबिक यह प्रक्रिया किसान विरोधी है, जिससे उनमें भारी रोष व्याप्त है। वर्ष 2010 में चीन के 10 बड़े जनआंदोलनों में पांच भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध थे। सुजाऊ शहर में किसानों ने टाउनहॉल पर जबरन कब्जा कर लिया। दो सप्ताह तक किसानों और पुलिस के बीच संघर्ष चला। इसके बाद पुलिस ने इन्हें जबरन निकाल दिया। शीजियांग शहर में अधिग्रहण के विरोध में किसान बीजिंग जाने को उतारू हुए, लेकिन पुलिस ने नाकेबंदी करके उन्हें रोक दिया। बस ड्राइवरों को धमकाया गया। तब किसान 50 किलोमीटर पैदल चलकर दूसरे रास्ते से बीजिंग जाने को निकले। पुलिस ने 30 गाड़ियां भेजकर पुन: इन्हें रोका और इन्हें टाउनहॉल ले आए। यहां किसानों ने उत्पात किया और टाउनहॉल और 18 पुलिस कारों की तोड़फोड़ की।

शियांग यी शहर की सरकार ने 60 गाड़ियों को ताओबू गांव में भूमि पर खड़े मकानों को गिराने के लिए भेजा। किसानों ने मशाल जलाकर एक-दूसरे को सूचना दी और इनका विरोध करने सब एकजुट हो गए। इससे इन्हें वापस जाना पड़ा। किसानों ने 22 सरकारी गाड़ियों पर कब्जा कर लिया। जाओटांग शहर के प्रमुख ने किसानों की भूमि का अधिग्रहण करके डेवलपर को भूमि बेच दी। इस सौदे में प्रमुख ने भारी लाभ कमाया। किसानों ने कंस्ट्रक्शन साइट पर बवाल किया तो शहर के प्रमुख ने 1000 पुलिसकर्मियों तथा गुंडों को भेजा। इस घटना में दो व्यक्तियों की मौत हो गई। इस प्रकार के हजारों विरोध चीन में आए-दिन हो रहे हैं।

चीनी व्यवस्था के कुछ सार्थक पहलू भी हैं। कृषि भूमि के अधिग्रहण के लिए राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक है। अधिग्रहित भूमि के बराबर बंजर भूमि पर कृषि करना अनिवार्य है। उद्देश्य है कि कृषि भूमि का अनावश्यक अधिग्रहण न हो। ऐसा ही प्रावधान हमारे कानून में भी डाला गया है। सरकार को प्रमाणपत्र देना होता है कि बंजर भूमि उपलब्ध नहीं है। चीन में क्रेता द्वारा प्रोजेक्ट की संभावना रपट प्रस्तुत की जाती है। यह हमारे कानून में सामाजिक प्रभाव आकलन के समकक्ष है। इससे प्रोजेक्ट के विस्तृत प्रभाव स्पष्ट होते हैं। तीसरा पहलू नीलामी का है।

चीन में अधिग्रहीत भूमि की सरकार द्वारा नीलामी की जाती है। इससे लाभ सरकार को जाता है, न कि डेवलपर को। हमारे कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं है। हमारे कानून में किसान को ऊंचा मूल्य मिलता है। राजग सरकार को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र है, न कि कम्युनिस्ट शासन। इस प्रकार के जनविरोधी कृत्यों का विरोध करने का चीन की निरीह जनता के पास कोई रास्ता नहीं है, परंतु भारत में विपक्षी नेता ऐसे कृत्यों पर बवाल करेंगे। चीन की जनविरोधी व्यवस्था यहां लागू करना राजग के लिए घातक होगा। ऐसा लगता है कि राजग-2 सरकार ने राजग-1 सरकार के अनुभव से सबक नहीं लिया है। इंडिया के शाइन करने के बावजूद राजग-1 सत्ता से बाहर हो गई थी। उसी दिशा में राजग-2 सरकार भी चलती दिख रही है। डेवलपरों के अनुसार हमारे कानून में भूमि अधिग्रहण करने में लगभग पांच वर्ष लग जाते हैं। सीआइआइ के पूर्व प्रमुख बी. मुथुरामन के अनुसार यह मुख्य परेशानी है। सरकार को चाहिए कि वर्तमान कानून को नरम बनाने के स्थान पर सरल बनाए जिससे प्रक्रिया शीघ्र पूरी हो सके। हालांकि समय इसलिए ज्यादा लगता है कि क्रेता ऊंचे मूल्य नहीं देना चाहते हैं। जैसे 25 लाख रुपये एकड़ का मूल्य दें तो 80 प्रतिशत किसान शीघ्र सहमत हो सकते हैं। इसी सहमति को 10 लाख रुपये के मूल्य पर हासिल करने में समय लगता है। एक जलविद्युत डेवलपर ने मुझे बताया कि उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून का सहारा लिया ही नहीं, क्योंकि वह प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहते थे इसलिए उन्होंने किसानों को मुंह मांगा दाम देकर सीधे भूमि को खरीद लिया। यदि उचित मूल्य दिया जाए तो अधिग्रहण शीघ्र हो सकता है।
ऊंचा मूल्य देने में अड़चन डब्लूटीओ की दिखती है। भूमि का ऊंचा मूल्य देंगे तो भारत में उत्पादित माल की लागत ज्यादा आएगी और हम आयातों का सामना नहीं कर पाएंगे। अत: राजग सरकार को डब्लूटीओ के ढांचे में जितना हो सके आयात करों को बढ़ाना चाहिए। भूमि अधिग्रहण कानून को नरम नहीं बनाना चाहिए। वास्तव में इसे और सख्त बनाने की जरूरत है। संसद की स्थायी समिति ने सुझाव दिया था कि जंगल संरक्षण कानून की तरह कृषि संरक्षण कानून बनाना चाहिए। केंद्र सरकार की अनुमति के बिना कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं करना चाहिए। मध्यम वर्गीय उपभोक्ता को सस्ता माल उपलब्ध कराने के लिए देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाना चाहिए।

बदलें नहीं भूमि अधिग्रहण कानून

Thursday, July 17, 2014 12:39 pm
दो वर्षों तक चले गहन और व्यापक विचार-विमर्श के बाद संप्रग-2 सरकार ने सितंबर 2013 में नए भूमि अधिग्रहण कानून को जब संसद से पारित करवाया तो वास्तव में यह एक ऐतिहासिक कदम था। इस बिल को पारित करते समय सभी राजनीतिक दलों ने उत्साहपूर्वक इसका स्वागत किया था। इस कानून ने 1894 में बने औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून को पूरी तरह बदल दिया। यह सही है कि नया कानून सभी को संतुष्ट नहीं करता और कोई भी कानून ऐसा कर भी नहीं सकता, लेकिन नए भूमि अधिग्रहण कानून की व्यापक रूप से सराहना की गई। उदाहरण के लिए इसने बलपूर्वक किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था को समाप्त कर दिया और इसके साथ ही भूस्वामी तथा भूमिहीन परिवारों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति में इजाफा हुआ। नए कानून के तहत विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और उनकी पूर्वस्थिति की बहाली के उपायों को अनिवार्य बनाया गया। इसने भूमि अधिग्रहण पर निर्णय लेने की दिशा में ग्राम समाजों को शक्ति दी। इस वर्ष जनवरी माह तक सुप्रीम कोर्ट ने चार अलग-अलग फैसलों में नए कानून को बरकरार रखने की बात कही है। असामयिक निधन से पूर्व भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे ने सार्वजनिक तौर पर बयान दिया था कि वे 2013 में बने इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे, लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय में उनके उत्तराधिकारी नितिन गडकरी कुछ अलग विचार रखते हैं। उन्होंने यह घोषणा की है कि वह नए कानून में बदलाव के पक्षधर हैं। विशेषकर ऐसा प्रतीत होता है कि इस कानून के सहमति संबंधी प्रावधान को हल्का किया जा सकता है, जो कहता है कि किसानों की लिखित सहमति के बाद ही निजी कंपनियों को भूमि अधिग्रहण की अनुमति दी जा सकेगी।
इसी तरह भूमि अधिग्रहण से पूर्व इसके सामाजिक प्रभावों का आकलन अनिवार्य करने की जो व्यवस्था की गई थी उसे भी हटाया जा सकता है। इस प्रावधान के तहत संबंधित भूमि और उस पर निर्भर लोगों की आजीविका खोने के संदर्भ में पूर्ण आकलन को आवश्यक बनाया गया है। संसद की स्थायी समिति ने इस बिल को अपनी अनुमति देने से पूर्व पुनर्समीक्षा के बाद यह कहा था कि सरकार निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण का काम पूरी तरह नहीं करेगी और इसके लिए कंपनियों को सीधे-सीधे भूस्वामियों से बातचीत अथवा डील करनी होगी। उस समय इस कमेटी की अध्यक्षता भाजपा की वरिष्ठ नेता सुमित्र महाजन ने की थी, जो अब लोकसभा की स्पीकर हैं। संप्रग 2 सरकार ने इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया था, क्योंकि यह महसूस किया गया कि भूमि संबंधी रिकॉर्ड के रखरखाव की जो स्थिति है और भूमि बाजार की जो कार्यप्रणाली अथवा तौर तरीके हैं उसके मद्देनजर औद्योगीकरण और शहरीकरण को गति देने के लिए निजी क्षेत्रों के लिए भूमि अधिग्रहण के काम में सरकार की भूमिका अभी भी जरूरी होगी। हालांकि इस तरह के भूमि अधिग्रहण के लिए संबंधित क्षेत्र के 80 फीसदी किसानों की लिखित सहमति आवश्यक होगी। इस क्रम में सार्वजनिक-निजी सहभागिता वाली परियोजनाओं, जैसे दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे सरीखे मामलों में 70 फीसदी लोगों की सहमति जरूरी होगी। इस मामले में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है। यदि पब्लिक अथवा आम जनता के हित में सरकार किसी योजना-परियोजना को संचालित कर रही है और जो जमीन पूरी तरह सरकार के हाथों में जानी है तो इसके लिए पूर्व सहमति आवश्यक नहीं होगी। इस क्रम में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि क्या जमीन का अधिग्रहण किया जाना वाकई आवश्यक है, लेकिन यह निजी तौर पर किसी तीसरी पार्टी के लाभ के लिए नहीं होना चाहिए। इसे कभी नहीं भूला जाना चाहिए कि 1894 में बना भूमि अधिग्रहण एक्ट एक कठोर कानून था, जो बड़े पैमाने पर विस्थापन और घृणित अत्याचार पर आधारित था, लेकिन यह सब कुछ विकास को बढ़ावा देने के नाम पर किया गया। इस कानून में सुधार की आवश्यकता ही इसलिए पड़ी, क्योंकि इसकी बुराइयों अथवा कमियों के मद्देनजर इसमें कोई भी सुरक्षा प्रावधान नहीं अपनाया गया। पुराने प्रावधान के तहत कोई भी अथॉरिटी एकतरफा यह निर्णय ले सकती थी कि जमीन उसे चाहिए। ऐसे मामलों की सुनवाई में भी ढिलाई बरती जाती थी। आज के समय में ऐसे प्रावधानों को जारी नहीं रखा जा सकता।
हो सकता है कि गडकरी को 80 फीसद लोगों की सहमति कुछ अधिक लगती हो, लेकिन जनहित में अधिग्रहण के पीछे का मुख्य भाव यही है कि अपनी जमीन से विस्थापित होने वाले लोगों को भी लाभ हो। यदि कुछ अन्य कारणों से आम सहमति हासिल करने में दिक्कत आ रही हो तो इसमें कानून का कोई दोष नहीं है, बल्कि वास्तव में वह तंत्र दोषी है जो कुछ अन्य तरीकों यथा भूमि माफिया आदि के द्वारा ऐसे कार्यों को अंजाम देता है। इन लोगों को हर हाल में रोका जाना चाहिए साथ ही लोगों को कमजोर करने वाली ऐसी किसी भी सहमति की आवश्यकता को कम किया जाना चाहिए और सरकार को चाहिए कि वह इस दायित्व को पूरा करे। हैरत की बात है कि सामाजिक प्रभाव के आकलन को असुविधाजनक करार दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि इससे कार्यो में देरी होती है, लेकिन किसी भी अधिग्रहण कार्य को शुरू करने से पूर्व क्या यह जरूरी नहीं है कि पूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए और इस संदर्भ में व्यापक जांच-पड़ताल हो। दूसरे शब्दों में अधिग्रहण की प्रक्रिया सरकारी अथॉरिटी की सनक और मनमानी का विषय नहीं होना चाहिए। सामाजिक प्रभाव का आकलन भी एक निश्चित समय सीमा में पूर्ण होना चाहिए। छह माह में इस काम को कर लिया जाना चाहिए। गडकरी का तीसरा बिंदु लचीलेपन का है। निश्चित ही नए कानून में यह होना चाहिए, लेकिन इसके द्वारा क्षतिपूर्ति जैसे प्रावधानों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। यह प्रगतिशील और उदार होना चाहिए। इस क्रम में राज्यों को यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले कि भूमि का अधिग्रहण किया जाए, इसे खरीदा जाए अथवा इसका पट्टा हो। इसी तरह उन्हें यह निर्णय लेने की भी स्वतंत्रता मिले कि बहुफसली सिंचित जमीन का खाद्यान्न सुरक्षा के मद्देनजर अधिग्रहण किया जाए या नहीं। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र द्वारा किसानों से जमीन की खरीददारी की स्थिति में पुनर्वास और पुर्नस्थापना के लिए राज्यों को शक्ति मिले। 2013 में यह कानून भाजपा के समर्थन से पारित हुआ था और अन्य सभी पार्टियों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा। आज सत्तासीन नेताओं ने पूर्व में सहमति आवश्यकता, सामाजिक प्रभाव आकलन और रेट्रोस्पेक्टिव प्रावधानों पर कोई प्रश्न नहीं उठाए थे। जो आलोचनाएं आज की जा रही हैं वह नई नहीं हैं। कानून को अंतिम रूप देते समय इन पर पर्याप्त विचार-विमर्श हो चुका है। नए भूमि अधिग्रहण कानून का निष्पक्ष पालन होना चाहिए, क्योंकि किसानों और अपनी आजीविका खोने वालों का हित सर्वप्रमुख है। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों को सर्वाधिक महत्व दिया गया है और इसे किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जा सकता।
-जयराम रमेश
ग्रामीण विकास मंत्रालय29-सितम्बर, 2013 18:51 IST

नया भूमि अधिग्रहण कानून जनोन्मुखी है लेकिन उद्योगविरोधी नहीं है। श्री जयराम रमेश ने नए कानून के बेहतर कार्यान्वयन में राज्य सरकारों से सहयोग की अपील की।
ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रमेश ने भारतीय उद्योग की इन आशंकाओं का निराकरण किया है कि नया भूमि अधिग्रहण कानून परियोजनाओं को आर्थिक दृष्टि से अव्यवहार्य बनाएगा। आज मुम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री रमेश ने कहा कि नया अधिनियम केवल उस भूमि के सिलसिले में लागू होगा जिसका अधिग्रहण केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए किया जा रहा हो। उन्होंने कहा कि नया कानून भूमि की निजी खरीद-फरोख्त पर कोई पाबंदी नहीं लगाता। उन्होंने कहा कि उद्योग जगत को सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण से बाहर निकल कर देखना होगा और भूमि खरीद के अवसर तलाश करने होंगे।

उन्होंने सरकार का यह दृष्टिकोण दोहराया कि भूमि अधिग्रहण अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाएगा और उनका मंत्रालय देश में भूमि रिकार्ड प्रबंधन में सुधार की दिशा में काम कर रहा है ताकि जमीन की बिक्री में पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जा सके। उन्होंने बताया कि 1000 करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय भूमि रिकार्ड आधुनिकी कार्यक्रम लागू किया जा रहा है जिसमें भूमि रिकार्ड के कम्प्यूटरीकरण, नक्शों के डिजिटीकरण और पुनः सर्वेक्षण पर बल दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र ने इस दिशा में प्रगति की है लेकिन उसे अभी हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक और त्रिपुरा की बराबरी करनी है।

श्री रमेश ने कहा कि पंजीकरण अधिनियम 1908 में संशोधन का विधेयक संसद में पेश किया गया है, जिसके पारित हो जाने के बाद भूमि की बिक्री और पंजीकरण संबंधी सभी रिकार्डों की जानकारी सार्वजनिक की जा सकेगी। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता बढ़ने से कारपोरेट क्षेत्र के लिए भूमि खरीदना आसान हो जाएगा।

विशेष आर्थिक क्षेत्रों -सेज के बारे में ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि सेज के लिए भविष्य में अधिग्रहण की जानी वाली समस्त भूमि नए अधिनियम के अनुसार खरीदी जाएगी। लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि अधिनियम में फिलहाल किसी सेज को विमुक्त करने संबंधी कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह बात दोहराई कि 119 वर्ष पुराने कानून का स्थान लेने वाला नया कानून ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा कि 1894 का अधिनियम गैर लोकतांत्रित था क्योंकि उसमें जिला कलेक्टरों को विवेकाधिकार के व्यापक अधिकार दिए गए थे। इसकी तुलना में नया कानून मानवीय है क्योंकि इसमें पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि यदि कोई कानून जनजातीय और सीमांत किसानों के कल्याण को प्रोत्साहित करता है तो वह निश्चित रूप से राष्ट्रीय हित में है। उन्होंने कहा कि पुराने कानून के मुताबिक सरकारें सस्ते दाम पर जमीन खरीद कर बाजार भाव से व्यापारिक घरानों को बेचती थीं। उन्होंने कहा कि पुराने कानून में अनिवार्यता का निर्धारण कलेक्टर द्वारा किया जाता था जबकि नए कानून में कलेक्टरों के अधिकारों को काफी कम किया गया है, जो अक्सर राज्य सरकारों के निर्देश पर काम करते थे। उन्होंने कहा कि नए कानून को संविधान की समवर्ती सूची में रखा गया है और राज्य सरकारें केवल किसानों के हित में मुआवजा बढ़ाने और अन्य प्रावधान कर सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नए कानून को 1 जनवरी, 2014 अथवा 1 अप्रैल, 2014 को अधिसूचित किया जाएगा।

वीके/पीके/डीके/एस/आरके/एसएस-6442
(Release ID 24605)

नया भू-अधिग्रहण कानून पिछले की तुलना में कुछ बेहतर- रघु ठाकुर

रघु ठाकुर
भू-अधिग्रहण, पुर्नवास व पुर्नस्थापन विधेयक 2012 को संसद ने बहुमत से पारित कर दिया।यह अधिनियम पिछले लगभग एक वर्ष से संसद में विचार के इंतजार में था।कानून के मूल ड्राफ्ट में 26 संशोधन भी आये थे जिनमें से 13 संशोधन संसद की स्थाई समिति ने प्रस्तावित किये थे।यह अधिनियम लम्बे समय से प्रतीक्षारत था और देश के विस्थापित और पीड़ित लोग इसके पारित होने के इंतजार में थे।यह अधिनियम ब्रिटिश काल में 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेगा।
   वर्ष 2012 में इस अधिनियम के प्रस्तावों पर विचार करने के लिये एक बैठक दिल्ली में गॉंधी शांति प्रतिष्ठान में आमंत्रित की गई थी।इस बैठक में केन्द्रीय गामीण विकास मंत्रालय के सचिव विशेष रूप से आये थे और जो लोगों की राय जानना चाहते थे।इस बैठक में, मैं स्वतः भी शामिल हुआ था और स्व. बनवारी लाल शर्मा (आजादी बचाओ आंदोलन) श्री सुरेन्द्र कुमार सचिव (गॉंधी शांति प्रतिष्ठान) आदि लोग शामिल थे।इस कानून की प्रस्तावना में ही यह कहा गया था कि यह कानून वैश्वीकरण की जरूरतों और औद्योगिक विकास की आवश्यकताओं को लेकर तैयार किया गया है।जबकि विस्थापन सर्वाधिक वैश्वीकरण की नीतियों और उद्योगों की स्थापना के नाम पर ही होता है।हम लोगों ने भारत सरकार के प्रतिनिधि से यह स्पष्ट कहा था कि अगर कानून उद्योगों के लिये ही बना है तो फिर उसकी आवश्यकता ही क्या है ? क्योंकि 1894 का कानून जो ब्रिटिश राज्य के आर्थिक, राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये बनाया गया था और जो एक अर्थ में भूमि अधिग्रहण, डकैती कानून था, को बदलने की जरूरत ही क्या पड़ी और अगर प्रस्तावित कानून पीड़ित किसानों, मजदूरों, विस्थापितों के लिये है तो फिर उद्देश्य में यह स्पष्ट होना चाहिये।
नया अधिग्रहण कानून यद्यपि कोई परिवर्तनकारी कानून नही है,फिर भी देश के औद्योगीकरण से विस्थापित किसानों के लिये कुछ राहत देने वाला है यथा -
1.शहरी क्षेत्रों में अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन के बाजार दर से दोगुना और ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार दर से चार गुना मुआवजा देने का प्रावधान है।आजकल कुछ लोग विशेषतः कारपोरेट जगत के लोग इसे औद्योगीकरण और विकास का विरोधी बता रहे है।वे इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि जिस किसान की जमीन अधिग्रहित की जाती है उसके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है क्योंकि जमीन ही उसका रोजगार और आजीविका है।आमतौर पर किसान शिक्षित और तकनीक शिक्षा में दक्ष नही है तथा संबंधित उद्योग में उन्हे रोजगार या नौकरी संभव नही होती।अपवाद स्वरूप ही किसी किसान के बेटों को संबंधित उद्योग में नौकरी मिल पाती है। म.प्र. के सागर जिले के बीना में तेल शोधक संयंत्र भारत और ओमान सरकार ने मिलकर लगाया जिस पर हजारों करोड़ रूपया खर्च हुआ है। किसानों की हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई परन्तु स्थानीय व्यक्तियों को रोजगार नही मिले हैं। यहॉं तक कि मजदूरी के लिये भी प्रदेश के बाहर के लोग अधिक पहुंचे।अगर कभी किसी स्थानीय व्यक्ति को चर्तुथ श्रेणी का रोजगार मिल भी जाता है तब भी वह अस्थाई होता है और अनुभव यह आया है कि कारखाने की स्थापना के कुछ दिनों के बाद उन्हे काम से हटा दिया जाता है। इस कानून में होना तो यह चाहिये था कि स्थानीय व्यक्ति को जिनकी जमीन और पानी, हवा और पर्यावरण सब कुछ उद्योग के नाम पर छिन जाता है, यहॉं तक कि चलने वाली सड़कें भी डम्पर, मशीनों और ट्रकों आदि के सघन परिचालन से मौत की सड़के बन जाती है, को कम से कम 50 प्रतिशत स्थाई नौकरियॉं आरक्षित की जाये।
2.सिंचित जमीन या दो फसली जमीन को अधिग्रहण से पूर्णतः अलग रखा जाना चाहिये था।हमने यह प्रस्ताव रखा था कि कानून में यह प्रावधान हो कि कारखाने, कृषि भूमि पर नही लगाये जायें।उन्हे या तो बंजर भूमि पर या फिर जो बंद कारखाने है, जिनकी संख्या लगभग 5 लाख है कि जमीन पर लगाया जाये परन्तु वैश्वीकरण की अनुयायी सरकार ने इन प्रस्तावों को इस कानून में पूर्णरूपेण शामिल नही किया।हालांकि दो फसली जमीन को शाब्दिक संरक्षण दिया गया है जो महत्वहीन है।
3.इस कानून में अवश्य यह अच्छा प्रावधान है कि सरकारी क्षेत्र के अधिग्रहण के लिये 70 प्रतिशत और निजी क्षेत्र के लिये अधिग्रहित की जाने वाली जमीन के प्रभावी किसानों का 80 प्रतिशत अगर जमीन देने को तैयार हो तभी शेष किसानों की जमीन का अधिग्रहण हो सकेगा।
4.हमने यह भी सुझाव भारत सरकार को दिया था कि जिनकी जमीन अधिग्रहित की जाती है उन्हे लगने वाले उद्योग में 40 प्रतिशत का मालिकाना हक दिया जाये ताकि उन्हे स्थाई तौर पर मुनाफे का 40 प्रतिशत हिस्सा प्रीमियम के रूप में मिलता रहे परन्तु यह प्रावधान नही हो सका।यद्यपि इतना प्रावधान अवश्य हुआ कि जब तक पुर्नस्थापन की कार्यवाही पूरी नही हो जाती तब तक किसानों को बेदखल न किया जाये।
5.सामाजिक प्रभाव के आंकलन का प्रावधान तो इसमे है परन्तु उसकी भाषा बहुत ही लचर है।अध्ययन और निरीक्षण किया जायेगा ऐसें शब्दों का इस्तेमाल किया है।परन्तु स्कूल अस्पताल, सामुदायिक भवन, बगीचे, पेयजल, चारागाह आदि को पूर्णतः मुक्त रखने का प्रावधान नही है।
6.हम लोगो ने यह भी सुझाव दिया था कि जमीनों को पूर्णतः अधिग्रहण करने के बजाय याने खरीदने के बजाय लम्बी लीज पर लिया जाये ताकि अगर कारखाने बंद होते हैं तो उस जमीन का मालिकाना हक उन किसानों को वापस मिले।आजकल उद्योगपतियों ने जमीन को हथियाने का नया तरीका निकाला है कि वे सरकार को प्रभावित कर कारखाना लगाने के नाम पर किसानों की जमीन का अधिग्रहण कराते है फिर कुछ समय पश्चात कारखाने को घाटे में बताकर बंद कर देते हैं तथा जमीन के मालिक बन कर जमीनों को करोड़ों में बेच लेते हैं।मुंबई और गुजरात की कपड़ा कारखानों की जमीनों को उनके मालिकों ने याने कारखाने के मालिकों ने खरबों रूपये में बेचा है जबकि जिस जमाने में जमीनों का अधिग्रहण किया गया था उस जमाने में किसानों की जमीन मिट्टी मोल भाव से ली गई थी।आज भी किसानों के हित में और न्याय के हित में यह सही होगा कि सरकार यह प्रावधान करे कि जमीनों को लीज पर लिया जायेगा और अगर कारखाना बंद होगा तो लीज, कारखाना बंदी के साथ स्वमेव खत्म हो जायेगी और किसान पूर्ववत मालिक हो जायेंगे।
7.उद्योग जगत के द्वारा इन अपर्याप्त प्रावधानों का भी यह कहकर विरोध किया जा रहा है कि इससे कारखानों की लागत बढ़ जायेगी तथा विकास पर असर पड़ेगा या फिर यह कि अधिग्रहण प्रक्रिया लम्बी खिचेगी।अब इन कारखानों के मालिकों से यह पूंछा जाये कि जहॉं उनके अन्य उद्योग लगे है या बड़े - बड़े महल खड़े हुये हैं अगर उसका अधिग्रहण कलेक्टर द्वारा निर्धारित पंजीयन दर पर किया जाये तो क्या वे तैयार होंगे।यह एक सुविदित तथ्य है कि आम आदमी भी पंजीयन शुल्क बचाने के लिये वास्तविक कीमत से कम कीमत बताता है और शासन के अधिकारी उन्ही कीमत के आधार पर भूमि की दर तय करते हैं।
8.विनिर्माण का क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का मुश्किल से 16 प्रतिशत है जबकि इतने हमले सहने के बाद भी आज भी कृषि देश की अर्थव्यवस्था का लगभग 40 प्रतिशत और रोजगार की दृष्टि से कृषि सम्पूर्ण निजी क्षेत्र से लगभग 60 गुना अधिक रोजगार उपलब्ध करा रहा है।निजी क्षेत्र जहॉं 80 लाख से एक करोड़ रोजगार देता है वही कृषि क्षेत्र लगभग 60 करोड़ लोगों को रोजगार दे रहा है व उनका पेट भर रहा है।औद्योगिक क्षेत्र में आयात, निर्यात से बहुत ज्यादा है और इसीलिये भारत को विदेशी व्यापार में प्रतिवर्ष कई लाख करोड़ रूप्ये का घाटा सहना पड़ रहा है जो कि आर्थिक मंदी का प्रमुख कारण है।अगर कृषि के क्षेत्र में दलहन, तिलहन का आयात हो रहा है तो यह किसानों की गलती नही है बल्कि सरकार की नीतियों की त्रुटि है जिसने अंर्तराष्ट्रीय षड़यंत्र में फंसकर अपनी दालों और तेलों का उत्पादन स्वतः कम करा लिया।
   यह नया कानून पिछले कानून की तुलना में कुछ बेहतर है।विस्थापितों को कुछ राहत देने वाला है परन्तु पर्याप्त नही है। खैर, जितना मिला वह भी पिछले तीन दशक के संघर्षों का परिणाम है।इसे लेकर आगे बढ़े और बकाया उद्देश्यों को हासिल करने के लिये संघर्ष जारी रखें और तेज करे यही समय की आवश्यकता है।  
सम्प्रति-लेखक रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक है।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है।

भूमि अधिग्रहण कानून

Author:
राकेश कुमार मालवीय
Source:
गांधी-मार्ग, सितंबर-अक्टूबर 2011
देश भर में अब तक 18 कानूनों के जरिए भूमि अधिग्रहण किया जाता रहा है। यह बात भी सामने आई है कि एक बार जमीन ले लेने के बाद उनके बलिदान के बदले उनको एक सम्मानपूर्ण जिंदगी देने में यह कानून विफल रहा है।
आजादी के बाद से देश में अब तक साढ़े तीन हजार परियोजनाओं के नाम पर लगभग दस करोड़ लोगों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अब जाकर सरकार को होश आया है कि विस्थापितों की जीविका की क्षति, पुनर्वास-पुनर्स्थापन और ठीक मुआवजा उपलबध कराने के लिए एक राष्ट्रीय कानून का अभाव है। यानी इतने सालों के भ्रष्टाचार, अत्याचार, अन्याय पर सरकार खुद अपनी ही मुहर लगा रही है। अनेक आंदोलन संगठन कई सालों से इस सवाल को उठाते आ रहे थे कि लोगों को उनकी जमीन और आजीविका से बेदखल करने में सरकारें कोई कोताही नहीं बरतती हैं। लेकिन जब बात उनके हकों की, आजीविका की बेहतर पुनर्वास और पुनर्स्थापन की आती है तो सरकारें कन्नी काटती नजर आती हैं। प्रशासनिक तंत्र भी कम नहीं है, जिसने खैरात की मात्रा जैसी बांटी गई सुविधाओं में भी अपना हिस्सा नहीं छोड़ा है।

इसके कई उदाहरण है कि किस तरह मध्य प्रदेश में सैकड़ों-साल पहले बसे बाईस हजार की आबादी वाले एक जीते-जागते हरसूद शहर को उखाड़ कर एक बंजर इलाके में बसाया गया। कैसे तवा बांध के विस्थापितों से उनकी ही जमीन पर बनाए गए बांध से उनका मछली पकड़ने का हक भी छीन लिया गया। एक उदाहरण यह भी है कि बरगी बांध से विस्थापित हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी का भरोसा दिलाया गया। पर आज बांध बनने के तीन दशक बाद भी प्रत्येक विस्थापित परिवार को तो क्या एक परिवार को भी नौकरी नहीं मिल सकी है।

जिस कानून के निर्माण का आधार और मंशा ही संसाधनों को छीनने और उनका अपने हक में दोहन करना हो, उससे और क्या अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन दुखद तो यह है कि सन् 1894 में बने ऐसे कानून को आजादी के इतने सालों बाद तक भी ढोया जाता रहा। इस कानून में अधिग्रहण की बात तो थी, लेकिन बेहतर पुनर्वास और पुनर्स्थापन का अभाव था। यही कारण था कि देश के सभी हिस्सों में भूमि अधिग्रहण अधिनियम विकास का नहीं, बल्कि विनाश का प्रतीक बनकर बार-बार सामने आता रहा है।

सरकार अब एक नया कानून लाना चाहती है। इस संबंध में देश में कोई राष्ट्रीय कानून नहीं होने से तमाम व्यवस्थाओं ने अपने-अपने कारणों से लोगों से उनकी जमीन छीनने का काम किया है। देश भर में अब तक 18 कानूनों के जरिए भूमि अधिग्रहण किया जाता रहा है। यह बात भी सामने आई है कि एक बार जमीन ले लेने के बाद उनके बलिदान के बदले उनको एक सम्मानपूर्ण जिंदगी देने में यह कानून विफल रहा है।

लेकिन नए कानून में जितना जोर जमीन के अधिग्रहण पर है उतना ही जोर प्रभावितों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन पर भी होना चाहिए। लेकिन इस नजरिए से नए कानून में कोई भी ठोस अंतर दिखाई नहीं देता। कानून में मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के प्रावधान सैद्धांतिक रूप से तो हैं पर उन्हें जमीन पर उतारने की प्रक्रियाएं स्पष्ट नहीं हैं।

आजादी के बाद से अब तक हुए विस्थापन के आंकड़े हमें बताते हैं कि सर्वाधिक विस्थापन आदिवासियों का हुआ है। नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध से दो लाख लोग प्रभावित हुए। इनमें से 57 प्रतिशत आदिवासी हैं। महेश्वर बांध में भी बीस हजार लोगों की जिंदगी गई, इनमें साठ प्रतिशत आदिवासी हैं। आदिवासी समाज का प्रकृति के साथ एक अटूट नाता है। विस्थापन के बाद उनके सामने पुनर्स्थापित होने की चुनौती सबसे ज्यादा होती है। उपेक्षित और वंचित बना दिए गए आदिवासी समुदाय के लिए इस प्रस्तावित अधिनियम में सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। लेकिन इस मसौदे में इसी बिंदु पर सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।

मसौदे में कहा गया है कि ऐसे सभी जनजातीय क्षेत्रों में जहां कि सौ से अधिक परिवारों का विस्थापन किया जा रहा हो, वहां एक जनजातीय विकास योजना बनाई जाएगी। देश की भौगोलिक संरचना में बसे जनजातीय क्षेत्रों में एक ही जगह सौ परिवारों का मिल पाना बहुत ही कठिन बात है। मजरे-टोलों में बसे आदिवासियों के लिए इस मसौदे में रखी न्यूनतम सौ परिवारों की शर्त को हटाया जाना चाहिए। ऐसा नहीं किए जाने पर आगामी विकास योजनाओं के नाम पर जनजातीय क्षेत्रों से लोगों का पलायन तो जारी रहेगा ही। उन्हें पुनर्वास और पुनर्स्थापन भी नहीं मिल पाएगा।

प्रस्तावित अधिनियम में जमीन के मामले पर भी सिंचित और बहुफसलीय वाली कृषि भूमि के अधिग्रहण नहीं किए जाने की बात कही गई है। जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादातर भूमि वर्षा आधारित है और साल में केवल एक फसल ही ली जाती है। तो क्या इसका आशय यह है कि आदिवासियों की एक फसली और गैरसिंचित भूमि को आसानी से अधिग्रहित किया जा सकेगा?

देश की भौगोलिक संरचना में बसे जनजातीय क्षेत्रों में एक ही जगह सौ परिवारों का मिल पाना बहुत ही कठिन बात है। मजरे-टोलों में बसे आदिवासियों के लिए इस मसौदे में रखी न्यूनतम सौ परिवारों की शर्त को हटाया जाना चाहिए। ऐसा नहीं किए जाने पर आगामी विकास योजनाओं के नाम पर जनजातीय क्षेत्रों से लोगों का पलायन तो जारी रहेगा ही।
सरकार जिस तरह अब खुद कहने लगी है कि तेल की कीमतें उसके नियंत्रण में नहीं हैं। उसी तरह संभवतः इस तंत्र को सुधार पाना भी उसके बस में नहीं है। भूमि अधिग्रहण का यह प्रस्तावित कानून भी ऐसी ही बात करता है। किसी नागरिक द्वारा दी गई गलत सूचना अथवा भ्रामक दस्तावेज प्रस्तुत करने पर एक लाख रुपए तक अर्थदंड और एक माह की सजा का प्रावधान किया गया है। गलत सूचना देकर पुनर्वास का लाभ प्राप्त करने पर उसकी वसूली की बात भी कही गई है। लेकिन मामला जहां सरकारी कर्मचारियों द्वारा कपटपूर्ण कार्यवाही का आता है तो इस पर कोई स्पष्ट बात नहीं मिलती है। वहां पर केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई करने भर का जिक्र आता है।

इस कानून को दूसरी योजनाओं के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए कम दरों पर अनाज की उपलब्धता इस देश के गरीब और वंचित उपेक्षित लोगों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मौजूदा दौर में इस व्यवस्था को कई तरह से सीमित करने की नीतिगत कोशिशें दिखाई देती हैं। विस्थापितों के पक्ष में इस योजना के महत्व को सभी मंचों पर स्वीकार किया जाता है। लेकिन भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास का यह प्रस्तावित कानून ठीक इसी तरह पारित हो जाता है तो तमाम विस्थापित लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली की इस व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे।

इस मसौदे में यह कहा गया है कि प्रभावित लोगों को ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र के मापदंडों के मुताबिक पक्के घर बनाकर दिए जाएंगे। इसका एक पक्ष यह भी होगा कि ये गरीबी की रेखा से अपने आप ही अलग हो जाएंगे, क्योंकि यह आवास गरीबी रेखा में आने वाले मकान के मापदंडों से बड़ा होगा। ऐसे में उन्हें सस्ता चावल, गेहूं और केरोसीन उपलब्ध नहीं हो पाएगा। होना तो यह चाहिए कि ऐसे प्रभावित परिवार जो विस्थापन से पहले गरीबी रेखा की सूची में शामिल हैं, उन्हें पुनर्वास और पुनर्स्थापन के बाद भी गरीबी रेखा की सूची में विशेष संदर्भ मानते हुए यथावत रखा जाए।

विस्थापन के जरिये विकास नहीं चाहिए - रोमा, अमर उजाला में

आखिरकार प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून को संसद के इस मानसून सत्र में भी टालना ही पड़ा। विवादों में घिरे होने की वजह से सरकार द्वारा इसे मंत्री समूह को सौंप दिया गया है। चूंकि अभी केंद्र सरकार अपने दामन पर लगी कालिख पोंछने में लगी है, इसलिए यह खबर सुर्खियों में नहीं है। इसी विवादास्पद कानून के खिलाफ पिछले महीने ‘संघर्ष’ के बैनर तले हजारों लोगों ने जंतर-मंतर पर धरना दिया। केंद्र सरकार भी जानती है कि इस समय भूमि अधिग्रहण कानून पारित करना ‘आ बैल मुझे मार’ वाली स्थिति होगी। इस कानून के खिलाफ पिछले पांच साल से देश भर के कई संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं।
इसके बावजूद इस कानून को लेकर सरकार उत्साहित है। उसके मुताबिक, अंगरेजों द्वारा 1894 में बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित कर उसी कानून को बेहतर बनाने और अधिग्रहण के एवज में किसानों को उनकी जमीन का बेहतर दाम दिए जाने का प्रावधान है। दरअसल सरकार को पूंजीपतियों के इशारे पर नव उदारवादी नीतियों के तहत उद्योग लगाने के लिए बड़े पैमाने पर कृषि भूमि के अधिग्रहण की जरूरत है। इसका दुष्परिणाम नंदीग्राम और सिंगुर में देखने को मिला, जहां सरकार को समझ में आया कि निजी कंपनियों के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण करना इतना आसान नहीं है। इसलिए इस प्रक्रिया को कथित रूप से जनहितकारी बनाने के लिए संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून को पारित करने की बात सरकार द्वारा जोर-शोर से की जाने लगी।
आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि सरकार इतनी तत्परता से भूमि अधिग्रहण कानून पारित कराने में दिलचस्पी दिखा रही है, जबकि जमींदारी विनाश व भूमि सुधार कानून, भूमि हदबंदी कानून और वनाधिकार कानून आदि के क्रियान्वयन का रिकॉर्ड काफी खराब है? साथ ही, देश में अभी तक कई परियोजनाओं में और तथाकथित विकास की सूली पर लगभग 10 करोड़ लोगों को चढ़ाया जा चुका है। इसके बाद भी मुआवजे का लालच देकर भूमि छीनने के काम को अंजाम देने पर सरकार आमादा है। जब तक अधिकार की बात नहीं होती, तब तक भूमि अधिग्रहण कानून का औचित्य नहीं। अभी ऐसे कानून की जरूरत है, जो संविधान के अनुरूप भूमि पर सार्वभौम अधिकारों को स्थापित करें। ऐसे कानून की जरूरत नहीं, जो लोगों से जल, जंगल और जमीन छीन लें।
चार बुनियादी सवाल हैं, जिनके जवाब सरकार को देने चाहिए। पहला, भूमि अधिग्रहण पर तभी बात हो सकती है, जब जमीन होगी। गौरतलब है कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में भूमिहीनों का सवाल ही नहीं है, बल्कि सार्वजनिक जमीनों को ही बेचा जा रहा है, जो सामंतों के कब्ज़े में हैं। दूसरा, सरकार ने जो जमीन अभी तक ली है, उसका क्या किया है। चूंकि जो जमीनें सार्वजनिक उद्योगों और राष्ट्रहित के लिए अधिग्रहीत की गईं, उन्हें भी निजी हाथों में बेच दिया गया। तीसरा, राष्ट्रहित के नाम पर देश में बनाए गए विभिन्न बांधों से जो करोड़ों लोग विस्थापित हुए, उनकी स्थिति क्या है। चौथा, क्या यह प्रस्तावित कानून हमारे संविधान के अनुरूप जल, जंगल व जमीन के पर्यावरणीय संदर्भ के बारे में ध्यान रखता है? अचंभित करने वाली बात यह है कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून की समीक्षा के लिए बनाई गई संसदीय समिति की सिफारिशों को भी मौजूदा सरकार सिरे से नकार रही है। पिछले दस वर्षों में लगभग 18 लाख हेक्टेयर कृषि लायक भूमि को गैर कृषि कार्यों में तबदील किया गया है। और जब तक नया कानून बन नहीं जाता, तब तक पुराने कानूनों के तहत कृषि एवं जंगलों की भूमि का अधिग्रहण जारी रहेगा, और बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा प्रशासन और राज्य सरकारों से मिलकर भूमि रिकॉर्ड की हेराफेरी कर भूमि की किस्मों को बदलने का आपराधिक कार्य भी जारी रहेगा।
इसलिए समय की मांग है कि नव उदारवादी नीतियों के खिलाफ आम नागरिक समाज प्रगतिशील ताकत, वाम दल, मजदूर संगठन आदि प्राकृतिक संपदा को कॉरपोरेट लूट से बचाने के लिए लामबंद हो। आज मुद्दा पर्यावरणीय न्याय का भी है। अगर पर्यावरणीय न्याय को सामाजिक समानता का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तो इससे सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होगा।
समाज
रोमा
edit@amarujala.com
जमीन से जुड़े ऐसे किसी कानून का कोई औचित्य नहीं है, जो आम आदमी को विस्थापित कर कॉरपोरेट घरानों को उपकृत करे।


कुल मिलाकर भूमि का अधिग्रहण समाज के लिए ग्रहण की तरह ही बना रहने वाला है।
http://hindi.indiawaterportal.org/node/35446

जमीन के इंतजाम से जुड़ी दिक्कतें हैं तमाम
देवेश कपूर, टी वी सोमनाथन और अरविंद सुब्रमण्यन / नई दिल्ली July 21, 2014




दो लेखों की शृंखला के पहले आलेख में देश में जमीन और उसके इस्तेमाल से जुड़ी विभिन समस्याओं पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं देवेश कपूर, टी वी सोमनाथन और अरविंद सुब्रमण्यन

देश के विकास को नई गति देने की फिक्र में लगी देश की नई सरकार खुद से यह सवाल पूछ रही होगी कि पूंजी, श्रम अथवा भूमि, में से कौन सा ऐसा तत्त्व है जो सबसे अनिवार्य है और जिसकी कमी सबसे बड़ी समस्या है? हम सार्वजनिक संस्थानों में ऐसी समस्याओं की अनदेखी करते हैं क्योंकि इस सिलसिले में उठने वाले मसले बेहद जटिल होते हैं और उनको हल कर पाना संभव नहीं होता। इस बात को ध्यान में रखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि विकास को लेकर पूंजी अपने आप में कोई समस्या नहीं है। हां, विविध चुनौतियां जरूर मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि इस दिशा में पर्याप्त प्रगति हुई है। भारत में घरेलू जमा की कोई कमी नहीं है और विदेशी पूंजी भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

श्रम बाजार की बात करें तो वह जरूर एक गंभीर समस्या है जिसे हम श्रम आधारित विनिर्माण क्षेत्र के खराब प्रदर्शन में भी देख सकते हैं। जहां तक बात देश के नियम और कानून और लाइसेंस राज की संस्कृति और व्यवस्थाओं की है तो उन्होंने अकुशल श्रमिकों के कामकाज को खासा मुश्किल बना दिया है। वहीं देश की शिक्षा व्यवस्था कुछ ऐसी है कि उसके चलते कुशल श्रमिकों की कमी लगातार बनी ही रहती है। लेकिन श्रमिकों के मामले में भी कुछ विकल्प मौजूद हैं, मसलन कारोबारी अनुबंधित श्रमिकों का सहारा ले सकते हैं, सेवाओं में तब्दील कर सकते हैं या फिर पूंजी और तकनीक आधारित तरीकों के जरिये उत्पादन कर सकते हैं। इन सबसे बढ़कर श्रमिक देश के भीतर यहां से वहां भी आ-जा सकते हैं।

लेकिन अगर जमीन की बात की जाए तो इनमें से किसी तरीके को नहीं अपनाया जा सकता है क्योंकि वह अचल होती है। भूमि बाजारों की बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि ये देश में सर्वाधिक विसंगतियों से भरे बाजार हैं। देश के विकास को लेकर जो भी चुनौतियां व्याप्त हैं उनमें से अधिकांश के मूल में यही मुद्दे हैं। इनमें शिक्षा से विनिर्माण, कराधान, शहरीकरण, पर्यावरण और ऊर्जा तमाम मुद्दे शामिल हैं।
सन 1960 के दशक के आंकड़ों को लेकर तुलना की जाए तो भारत अन्य देशों के मुकाबले भू संसाधन में कमजोर नजर आता है। हालांकि वर्ष 2050 तक उसका भूमि-आबादी अनुपात चार गुना तक गिर जाएगा और हमारा देश दुनिया के उन देशों में शामिल हो जाएगा जहां जमीन की सर्वाधिक कमी है। इनमें भारत के अलावा बांग्लादेश, मॉरीशस और नीदरलैंड शामिल हैं। वहीं सन 2050 तक चीन जमीन के मामले में भारत से चार गुना बेहतर जबकि ब्राजील 20 गुना बेहतर स्थिति में होगा। इसमें चकित होने वाली बात नहीं है। जरा इस बात पर विचार कीजिए, 1991 से 2011 के बीच देश की आबादी में उससे ज्यादा लोग जुड़ गए जितनी कि आजादी के वक्त देश की आबादी थी।
अगले दो दशकों में अगर भारत का विकास- 7-8 फीसदी की दर से होता है तो वाणिज्यिक और औद्योगिक, आवासीय और बुनियादी क्षेत्र के कामों के लिए जमीन की मांग में तेज गति से इजाफा होगा। विडंबना यह होगी कि देश जितना समृद्घ होता जाएगा जमीन की कमी का संकट उतना ही गहरा होता जाएगा।  जमीन की कमी का विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सबसे पहली बात, उत्पादन के कारक के रूप में जमीन की लागत तेजी से बढ़ती है। इसका असर जमीन से जुड़ी सारी गतिविधियों पर पड़ता है।
दूसरी बात, जमीन की कमी के कारण  किराये में भारी बढ़ोतरी होनी तय है। ध्यान दिया जाए तो जमीन से जुड़े घोटालों, विवादों आदि ने देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है। तीसरी बात, शिकागो के चांग थाई सिए की दलील है कि श्रम बाजारों में विसंगति, खासतौर पर शहरी क्षेत्र के श्रम बाजारों की विसंगति आर्थिक विकास की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है क्योंकि इससे श्रमिकों के यहां-वहां जाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। आर्थिक विकास का एक बड़ा हिस्सा अथव्यवस्था के ढांचागत बदलाव से ताल्लुक रखता है क्योंकि श्रमिक कम उत्पादकता वाले ग्रामीण इलाकों में अधिक उत्पादकता वाले शहरी क्षेत्रों का रुख करते हैं। वहीं बड़ी संख्या में श्रमिक कम उत्पादकता वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी फंसे हुए हैं।

श्रम बाजारों की विसंगति की बात करें तो देश में भूमि अधिग्रहण कानून से जुड़ी समस्याओं से भला कौन परिचित नहीं है। सन 1894 से चले आ रहे पुराने कानून का स्पष्ट मानना था कि सरकार को सस्ती से सस्ती दर पर जमीन का अधिग्रहण करने का अधिकार होना चाहिए। दूरदराज इलाकों के जमींदार शोषक की भूमिका में रहे हैं। आजादी के बाद इस कानून का इस्तेमाल करके सरकार ने लोकहित में बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण किया। अक्सर यह जमीन जनजातीय समुदाय के लोगों से छीनी गई और बदले में उनको मामूली मुआवजा दिया गया।

इस बात ने शहरीकरण को लेकर पहले से ही गड़बड़ हमारे रवैये को और अधिक बिगाड़ दिया। इस संबंध में जो भी उच्च आदर्श जताए गए थे वे सभी समय की कड़वी हकीकतों के सामने मात खा गए। शहरी मध्य वग के हितों की रक्षा की कोशिश में आपूर्ति कम होती गई और आवासीय बाजार में आधुनिकता का प्रवेश ही नहीं हो सका। बने बनाए मकान खाली पड़े रहे क्योंकि मालिकों को यह डर था कि या तो वे इसका किराया नहीं बढ़ा सकेंगे या किरायेदार मकान खाली नहीं करेगा। वहीं कारोबारी जगत तो नये अपार्टमेंट आदि बनाने के लिए हतोत्साहित किया जा रहा है। इसका प्रभाव गरीबों और मध्य वर्गीय लोगों पर पड़ता है जो प्राय: मकान मालिकों की दया पर निर्भर होते हैं और जिनको मकान से हटाने के लिए कभी बाहुबल तो कभी पैसे की मदद ली जाती है।

वर्ष 2013 में संप्रग सरकार ने एक नया विधेयक पारित किया जिसमें निम्रलिखित बात शामिल थी: राज्य को निजी क्षेत्र के भूमि अधिग्रहणकर्ताओं के समक्ष छोटे और कमजोर भूस्वामियों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। इस नजरिये में दो कमजोरियां मुख्य रूप से थीं। पहला, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रियात्मक बाधाओं में इजाफा करने के दौरान यह देश में जननीति का मुख्य सबक ही भूल गया। जटिलता हमेशा देरी की वजह होती है और कई बार इसके चलते क्रियान्वयन में भी समस्याएं पैदा होती हैं। ऐसे में परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली देरी से उनकी लागत में इजाफा होता है। इसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। दूसरी बात, इस नजरिये का बहुत साधारणीकरण कर दिया गया है। इसमें मान लिया गया है कि भूमि अधिग्रहण का हर मामला वैसा ही होता है जैसा कि ओडिशा के जनजातीय लोगों और वेदांत जैसी कंपनी के मामले में हमें देखने को मिला।

अधूरी परियोजनाओं का रास्ता अब होगा साफ

धर्मेद्र चंदेल, ग्रेटर नोएडा : जमीन न मिलने के कारण अटकी पड़ी शहर की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को अब पंख लगेंगे। प्रदेश सरकार ने नए भूमि अधिग्रहण बिल में पहला बदलाव किया है। इस बदलाव से रेल, सड़क, पुल, पावर प्लांट एवं औद्योगिक विकास की योजनाओं के लिए जिलाधिकारी को सौ एकड़ तक जमीन अधिगृहीत करने का अधिकार मिल गया है। अभी तक डीएम को सिर्फ दस एकड़ तक भूमि अधिगृहीत करने का अधिकार था। वहीं जमीन न मिलने के कारण मेट्रो, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल (डीएमआइसी) एवं सड़कों के चौड़ीकरण की योजना खटाई में पड़ रही थी। इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए प्राधिकरण अब जिलाधिकारी के माध्यम से शीघ्र जमीन अधिग्रहण के प्रस्ताव शासन को भेजेगा। अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होते ही परियोजनाओं का निर्माण शुरू हो जाएगा।
उल्लेखनीय है कि एक जनवरी से समूचे देश में भूमि अधिग्रहण बिल के लागू होने के बाद प्राधिकरण को जमीन मिलनी बंद हो गई है। नए बिल में इतनी पेचीदगी है कि उसके हिसाब से भविष्य में भी जमीन अधिग्रहण करना आसान नहीं होगा। वहीं प्राधिकरण की कई परियोजना ऐसी हैं, जो जमीन न मिलने के कारण बीच में फंसी हुई हैं। इन पर काफी हद तक काम भी हो चुका है। फंसी योजनाओं के निकलाने के लिए प्रदेश सरकार ने बिल में बदलाव किया है। कैबिनेट से मंजूरी के बाद इसे लागू भी कर दिया गया है।
हटेगी अब डीएमआइसी के निर्माण की अड़चन
जमीन न मिलने का सर्वाधिक असर दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर (डीएमआइसी) के निर्माण पर पड़ रहा था। यह महत्वाकांक्षी परियोजना मुंबई से शुरू होगी। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आदि सात राज्यों से होती हुई यह परियोजना ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी रेलवे स्टेशन पर पहुंचेगी। बाकी राज्यों में इसका निर्माण शुरू हो चुका है। जिले में जमीन न मिलने के कारण योजना पर काम नहीं हो पा रहा था। प्राधिकरण समझौते के आधार पर जमीन लेने में लगा था। नए बदलाव के बाद प्राधिकरण अब अधिग्रहण की कार्रवाई करेगा। इस परियोजना से ग्रेटर नोएडा और आसपास के क्षेत्र में करीब 72 हजार करोड़ रुपये का पूंजी निवेश होगा और 12 लाख लोगों को नौकरी मिलेंगी।
मेट्रो के निर्माण का रास्ता भी बढ़ेगा आगे
नोएडा से ग्रेटर नोएडा के परी चौक तक मेट्रो लाने में कोई अड़चन नहीं है। इससे आगे बोड़ाकी रेलवे स्टेशन तक मेट्रो को ले जाने के लिए प्राधिकरण को जमीन नहीं मिल रही थी। इस वजह से योजना की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) नहीं बन पा रही थी। अब इसका रास्ता भी साफ हो जाएगा।
कई सड़कों के निर्माण की बाधा भी होगी दूर
जमीन न मिलने की वजह से अल्फा सेक्टर से बोड़ाकी जाने वाली 105 मीटर चौड़ी सड़क का काम भी जुनपत गांव के पास पिछले कई वर्षो से रूका पड़ा है। प्राधिकरण नए कानून के हिसाब से जमीन अधिगृहीत कर सड़क का मार्ग खोलेगा। इसके अलावा सैनी गांव से बादलपुर जीटी रोड तब बनने वाली 60 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण भी वैदपुरा गांव के पास रूका पड़ा था। जमीन मिलने के बाद इसे भी पूरा किया जा सकेगा।
पुल निर्माण में भी आएगी तेजी
जमीन उपलब्ध न होने के कारण दादरी रेलवे ओवर ब्रिज, बोड़ाकी गांव के पास दिल्ली-हावड़ा ट्रैक के ऊपर बनने वाला पुल व हिंडन नदी के ऊपर जलपुरा व बिसरख गांव के बीच बनाए जाने वाले पुलों का निर्माण भी जमीन मिलने के बाद पूरा हो सकेगा।
तीन से चार माह में स्वीकृत हो जाएंगे अधिग्रहण के प्रस्ताव
अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए प्राधिकरण शीघ्र सौ एकड़ तक के जमीन अधिग्रहण के प्रस्ताव तैयार कर जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को भेजेगा। तीन से चार माह में प्रस्तावों को शासन की मंजूरी मिल जाएगी। इसके बाद इन परियोजनाओं का निर्माण में लगा रोड़ा पूरी तरह से हट जाएगा।
मेट्रो व डीएमआइसी ऐसी परियोजनाएं हैं, जिसके शुरू होने के बाद ग्रेटर नोएडा की तस्वीर बदल जाएगी। इनमें लोगों को अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए। प्राधिकरण की कोशिश इन परियोजनाओं को शीघ्र पूरा कराने की है। लोग इसमें सहयोग करें।
-रमा रमण, चेयरमैन व सीईओ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा



Jul 15 2014 : The Times of India (Kolkata)
TOI EXCLUSIVE - Land acquisition law set for rejig
Mahendra.Singh@timesgroup.com
New Delhi:


Social Impact Review May Be Diluted
The government is considering radical changes in the land acquisition Act to enable speedier project implementation by diluting the social impact assessment and consent clauses which are seen to hamper land purchase.
The proposed changes to the Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act follow rural development minister Nitin Gadka ri's consultations with states yielding a wide consensus in favour of amending the law.
The likely points for ac tion shortlisted by the rural development ministry for the PMO's consideration include removal of the consent clause for public-private partnership projects. Alternately, it is proposed to reduce the consent requirement to 50% of land owners. Under the law passed last year, PPP projects would have required consent of 70% of land owners. The note has argued that the clause should be revisited as ownership in PPP projects vests with the government.
Unwilling to oppose a populist law before the Lok Sabha elections, BJP had supported the bill when it was brought to Parliament despite misgivings about the impact the Act would have on costs and timelines. The BJP manifesto had hinted at reviewing the Act and the Modi government lost no time in consulting states after assuming office as land acquisition is a key element in its plans to revive growth.
The proposals, however, are silent on whether the provisions stating that compensation for acquisition in rural areas will be four-fold the market price and twofold in urban regions will be revisited. The social impact assessment clause has been both praised and slammed. Activists feel SIA mainstreams evaluation of the cost-benefit equation by factoring in social and environmental variables.
On the other hand, its critics feel SIA processes are too elaborate and will delay projects and rather than making assessments more predictable, will achieve the opposite.
The ministry has proposed a second look at the “affected family” clause on the ground that it is very elaborate and includes “livelihood losers” who have been working on the affected land for three years before acquisition. The rollback of several controversial provisions of the Act will require considerable political finesse and Gadkari promised that the interests of farmers would be protected in any such review. Yet, as the action points indicate, the task is not easy. The ministry has highlighted that development of “culturable wastelands” in lieu of “multi-cropped irrigated land” needs to be amended as states like Delhi, Goa, Himachal Pradesh and Uttarakhand do not have any such wasteland. The clause stipulating that land acquisition proceedings would lapse in case compensation is not paid or physical possession is not completed is up for modification as well.
For the full report, log on to http://www.timesofindia.com

Jul 21 2014 : The Economic Times (Kolkata)
MONDAY Musings - Protected Farming, Storage and Warehousing Up on Priority List
HARSH KUMAR BHANWALA CHAIRMAN, NABARD



Nabard is focusing on ways to contain inflation by removing supply constraints, says Bhanwala
Harsh Kumar Bhanwala, chairman of the National Bank for Agriculture and Rural Development (Nabard), spoke to Gayatri Nayak about the ruralfocussed bank's efforts to help control food inflation and support farmers.
He emphasised the need for initiatives to extend the reach of institutional credit across the agricultural sector. Edited excerpts: What are Nabard's initiatives in controlling high food inflation?
The country faces the biggest challenge in food inflation. The most stubborn inflation is in protein-based nutrients -milk, egg, meat, fish. Here, we have been trying to contain inflation through monetary measures.
But unless we remove the supply constraints, long-term inflation reduction in these commodities is not possible.
From Nabard's side, my priorities are to reduce inflation in these commodities. First of all, we have to encourage lending to certain specific activities.
We need protected agriculture, or agriculture in controlled conditions, which is efficient agriculture which, among others, minimises the use of water and fertiliser. In controlled conditions, we have lesser pests also. It's possible to some extent in tomatoes and potatoes. I am giving a cut in refinance rate to all lending by banks to these priority areas and also postproduction activities such as warehousing and storing. Nabard has initiated three pilot projects -for potatoes in Hooghly, West Bengal, for tomatoes in Karnal, Haryana and onions in Nashik, Maharashtra -with an outlay of `. 35 crore.
What could be done to help farmers get better price realisation?
Minimum support price is relevant.
When prices are going up, they themselves are an incentive. In case of wheat and rice, the risk is minimum because insurance is available, defined practices are there and also wa ter is available. A market mechanism is there for cereals. In the case of milk, there is a significant mechanism. But for eggs and meat, there is no such formal mechanism. That is the real problem. In terms of market support, a lot needs to be done. Milk is the most perishable commodity. So, warehousing funding as well as cold-chain storage is priority. We are committed to creating larger warehouses. We are working closely with the Warehouse Development and Regulatory Authority through consultancy arm Nabcons, which is giving accreditation to warehouses. These warehouses will be able to provide negotiable warehouse receipts to farmers which, in turn, will prevent distress sales (of produce) by farmers. This will help farmers achieve a robust price discovery for their produce.
Have you made any plans to minimise the possible losses arising out of El Nino, which is normally associated with weak monsoon?
We have told all our regional offices that in case the rainfall is less and the revenue department declares damage to crops, there are two measures.
One, any existing loans will be rephased and also fresh loans will be given so that next year's plan is not affected. We have also made a contingency plan for providing liquidity support. Besides, lending to allied activities such as milk production, which do not get impacted immediately, will be given priority this year. We want to ensure that credit line for this sector is not choked.
The average size of land holding is coming down. What could Nabard do to improve agriculture productivity in such a situation?
Aggregation is the next big thing that is required. We have to try to aggregate these holdings where it is possible and this could happen either at the input level or output level. Nabard is funding purchase of tractors which can be leased out to individuals. We have funded farmers in some cases who have come together to buy seeds or any other inputs. Nabard supports 1.4 lakh farmer clubs or farmer interest groups across the country. Nabard takes care of their meeting expenses. It is not a big amount, but it is a big discussion platform and exchange of ideas which can help them in marketing their produce. This, we feel, will ultimately lead to formation of producer organisation comprising small and marginal farmers who account for 70% of landholding in the agricultural sector.
How could farmers who are financially excluded get formal credit?
There are a large number of landless tillers or lessees who actually do not hold land who are out of the purview of institutional credit. Andhra Pradesh has started issuing qualifying certificates to the farmers which entitles such lessees to borrow. Nabard had helped here. Such schemes should be propagated to other states as well.
gayathri.nayak@timesgroup.com



Jul 15 2014 : The Economic Times (Mumbai)
Govt Calls All-party Meet on Land Acquisition Act

NEW DELHI
OUR POLITICAL BUREAU


SEEKING REVISION After state governments request for a relook at UPA's Land Acquisition Rehabilitation and Resettlement Act, Centre plans to build consensus through all-party meet
Most state governments have sought a relook at UPA's Land Acquisition Rehabilitation and Resettlement Act, 2013, pushing the Centre into convening an all-party meet, probably as early as the next fortnight. A consensus at the meeting of all parties heading state governments will let the Centre amend the law in the current monsoon session itself.
This revision of the land law is imperative for the Centre to execute major infrastructure projects through the public-private partnership route as envisaged in Arun Jaitley's budget.
Land acquisition has come up as the single biggest hurdle for most of the new mega industrial projects.
The Samajwadi Party government of Uttar Pradesh, AIADMK's in Tamil Nadu, Trinamool Congress' in West Bengal and BJD's in Odisha, accounting for most of the non-BJP, non-Congress state governments and a chunk of votes in the Rajya Sabha where BJP is in a minority, are keen on getting the Act amended for various reasons.
Many states want complete autonomy on issues of land acquisition, keeping the Centre at arm's length.
For instance, West Bengal has categorically sought to have its own land acquisition policy. Tamil Nadu wants the “power to define public purpose“ and feels the present act is an “infringement upon the state's autonomy.“ UP too has sought similar powers for the state government. Odisha, though has refrained from making political demands, is expected to go along with the Centre on getting the Act amended.
Rural development minister Nitin Gadkari had organised a conference of revenue ministers of all state governments on June 27 and ET had reported on July 7 the possibility of government tweaking the Land Act to speed up key projects.
The consensus that emerged at the conference of the revenue ministers of the state governments is that, “consent clause should be removed from PPP projects, the definition of affected family needs to be re-examined, autonomy for state governments, social impact assessment only for large projects, retrospective clause for compen sation should be modified, penalty provisions against civil servants are too stringent, return of unutilised land to original owners to be deleted“ and a few other instances of radical departure from UPA's show piece legislation that was deemed as anti-industry.
Interestingly, Congress-ruled states such as Kerala slammed the central Act, while conclusively seeking state specific Acts on land acquisition. “Obtaining consent of land owners prior to preliminary notification is a herculean task as the identification of land owners at such initial stages may pose a problem,“ said the Kerala government's representative. Haryana wanted the consent requirement to be done away with. While Karnataka insisted, “social impact study should be compulsory only for large projects.“




Jul 15 2014 : The Times of India (Kolkata)
`I've cushioned against Parliament's powers to tax retrospectively & create fresh liability'
Sidhartha & Surojit Gupta
TNN


Finance Minister Arun Jaitley, who presented his maiden Budget last week, says he's for putting more money in the hands of taxpayers, so they save more and spend more. He tells TOI how his focus on infra, manufacturing, realty and agriculture will boost the economy
Was it difficult to prepare the Budget while wearing multiple hats as minister, with no chief economic advisor and without a colleague in the Planning Commission?
(Smiles) We're in the process of appointing a CEA. Of course, more advisory hands would always be helpful but since the government had just taken over some comforts were missing. There is a timeline for the government to present the Budget and get it approved. We had to work bearing the reality of the system in mind. Was it difficult? No it wasn't difficult. It certainly would have helped if the established systems were already there. When you first saw the economic data in front of you after you took over, what went through your mind?
It wasn't as if it was a closely guarded secret. That the economy was, and is still in, a very challenging situation, that investors, both international and domestic, were losing faith in India, that there is a strong opinion against our taxation regime, and that our decision-making was perceived to be very slow weren't secrets.
Once people decided to invest, different departments were creating hurdles. Therefore, one had to set the economy on a course where at least the direction got identified.
Some decisions can be taken at the time of the Budget, when the proposals are all approved by the Cabinet, but there's a lot of decision-making which takes place outside the Budget. For each of the decisions we were taking within a span of 45 days, we had to be clear in our mind that there must be a pattern in the direction in which we are moving.
Have you refrained from making a full disclosure on the fiscal health of the economy? I've said so to the extent it's necessary, in cautious and measured language. I'm not in the process of scoring debating points with the previous government.
Now, we've to deliver. And, if we've to deliver, I didn't want to make any statement which upsets the sentiment. My job is to create a positive sentiment for India.
So you were apprehensive that a full disclosure may upset the sentiment?
I wouldn't say that. To the extent the disclosures are necessary I stand by all those disclosures. I've given the indication on the challenges before me, I have said so.
Your predecessor has said your statements validate what they were saying... and that you people were just trying to create a scare...
It's reasonably difficult for them to be critical of the Budget. So, they were trying to invent the criticism. When they think these are their ideas, I'm sure their leaders will stand up in both Houses and support the Budget.
But the fact is a large part of my job was to clear the mess they had left behind. I had to untie several knots.
Taxation, particularly, is one of them.
What was messy about the tax policy?
The taxation policy followed in India and the functioning of the tax administray, tion had created a scare among invesm tors. There are four important things g that I've done in this Budget. I've prot. vided a complete cushion against powers o of Parliament to tax retrospectively to e create fresh liability. Two, even for doy mestic investors, I've created an advance r ruling mechanism before they take their decision. Three, I've tried to remove dis cretion, which is responsible for lots of litigation in transfer-pricing matters.
Four, I've created a consultation mecha e nism between industry and CBDT, the ll outcome of which will result in statua tory guidelines. As we learn from future e experiences, I'm willing to travel a little more distance, but this is the direction.
Why did you limit FDI in defence at 49%?
The decision on FDI in defence at 49%, subject to FIPB and Indian control, will go a long way to bring investments.
e There are two views on this. The first is, why allow FDI in defence? The answer y is very simple ­ we are buying complete ly from foreigners so it's always better to set up our own hubs in India? The second is why not 51% FDI (cap)? I wouldn't have achieved the overall objective with 51%. There is no significant difference between a foreign manufacturer manufacturing outside India and manufacturing in India. But my proposal shifts manufacturing substantially to India, ensures there is Indian control, subject to the benefits of investment and technology. So, neither of those two options ­ disallowing FDI in defence and 51% FDI ­ had the kind of merit that the 49% FDI proposal had. Will foreign players transfer technology with 49% FDI?
Let's wait and see. We have just started it, but I am quite hopeful. In fact, initial inquiries indicate that there is some element of enthusiasm and interest in 49% FDI.
You had said reforms have to be politically acceptable...
Every reform has to be politically acceptable. If you start with an area of confrontation you get blocked at step one. There are lots of steps that can be taken while avoiding confrontation. I'm not unwilling to confront. Let's first go on a track where we're able to deliver several steps. For instance, the opening of FDI to 49% in defence and insurance and relaxing the conditions in real estate is capable of attracting investment. The real estate investment trust (REIT) with a passthrough tax rebate is capable of attracting investment. Bank recapitalization, subject to their public sector character being retained, can infuse a lot of funds into banks. Take goods & services tax (GST). We may have to make some compromises to keep one or two products out, because the states are demanding that. So, instead of the best GST we can settle for a good GST instead of not doing anything like UPA did for seven years.
Manufacturing seems to be a key theme...
There's a pattern ­ I've consciously encouraged manufacturing, consciously encouraged real estate, consciously encouraged infrastructure, consciously encouraged agriculture. E-visas and visa on arrival can change the face of tourism in this country. It's obvious if you ask people in the tourism industry .
It has the capacity to speed up tourism.
To those who say you haven't looked at the social sector I say we haven't scrapped any programme. We haven't reduced any funding to them, but yes, we'll tweak some of them. My consistent effort was to give a fillip to manufacturing. So, even before the Budget, I extended the excise duty concessions. In the Budget, by and large, the policy thrust was to support manufacturing.
So, I have brought down duties. For MSMEs, I've brought down the limit on investment allowance from Rs 100 crore to Rs 25 crore. For the power sector, various excise and customs duties have been reworked keeping their interest in mind. The inverted duty structure has been corrected.
Before elections you said interest rates should be lowered. What are your views now?
This comes in the RBI's domain. But my view is that once inflation starts moderating a little, interest rates should be reduced. This'll help various sectors. I've just given the example of how we're trying to encourage real estate. If my tax incentives have an impact on real estate and if interest rates come down, there'll be huge impact. Look at my tax proposals. I don't think an individual taxpayer has got this kind of a relief in any Budget. In a world of inflation my policy has been to give more money in the hands of the spender so that he spends more and saves more. So, I've provided more money in their hands and incentivized their savings -both in saving instruments as also in a house, which ultimately goes into the system.
Was this a thanksgiving Budget for middleclass voters?
It was because of my own and the PM's economic ideology that lower taxation will lead to more economic activity , more spending and more saving.
What is the reason for downplaying the disinvestment target?
It's clearly mentioned in the accounts.
At present I'm only following what UPA had decided. If they say I'm following them on disinvestment, they're right.
When NDA was doing disinvestment, UPA opposed it. Then they had their own brand of disinvestment. For the present, I am happy following their brand.
Will there be any change in the disinvestment strategy in future? Will we see strategic sales again?
The present policy can be with regard to those where shares have a greater acceptability in the market. What to do for those that are unrevivable and for those in which there's no investor appetite?
We've just started. Let's see, we'll decide as we go along.
There's a concern over GAAR (General AntiAvoidance Rules). When will the government review it?
I must confess in the last 45 days we've been busy with the Budget and I've not applied my mind to it. So, when a parliamentary question comes, the old policy continues. When I've a look at it, it's quite likely I may take another view.
There are many issues on which we've not taken a view, GAAR is one of them.
It's not that we can change the stand in one day . We've to have a look at it. You've been criticized for earmarking Rs 200 crore for a Sardar Vallabhbhai Patel statue while allocating just Rs 100 crore for several important schemes...
Congress has been in power for the longest period of time. There's a comment from their vice-president on Rs 100 crore (allocation) for various schemes. Congress ought to have a better idea of governance.
The schemes are yet to be framed and onethird of the year is over. Over the next few months the scheme will be framed. In the first year only a token amount is spent.
Then, once the scheme is framed, the actual (spending) is allocated. Suppose I allocate a new AIIMS to a state, and they are yet to acquire land or have their plan sanctioned. What then would be the purpose of allocating it huge amounts of money?
It'll be difficult to spend even Rs 10 crore in the remaining eight months of the fis cal. Hence, the allocation of a token Rs 100 crore. In the revised estimate it can go somewhere else. Earlier they used to provide Rs 1 crore to such nascent schemes. So once a scheme is framed you pay what's necessary .
This isn't the value of the whole scheme.
On the Sardar Pa tel statue, I think in honouring Sardar Patel this country hasn't returned the debt to this great son.
India owes the present shape of its geography to Sardar Patel. He's been least remembered and least talked about. When the Sardar passed away there were many senior colleagues in the Cabinet who demanded that a statue should be erected at Vijay Chowk. Ultimately, it was erected on Parliament Street. Now, if a huge memorial is being constructed to honour him, merely because he didn't belong to a glamourized background an allocation of Rs 200 crore should not be resisted.
Others whose contribution is miniscule compared to Sardar Patel have hundred of institutions named after them.
You said not everything can be done in the Budget. Will the bitter pills come outside the Budget?
When the PM uses the words “bitter pill“ the obvious meaning was not that I'm going to impose higher taxes on you.
Either to encourage manufacturing or to have more money in the hands of the taxpayer, higher taxation is against the PM's ideology . The “bitter pill“ will not be in the shape of higher taxation. It could mean that for utilities the user will have to pay for what they use. Unless users pay, utilities can't survive.
How do you create an atmosphere of trust for consumers that higher charges for utilities will mean better facilities and service?
Well if governments are honest, there are no scams, and the leadership has credibility, people should ordinarily accept what the government says and does. Is there a huge risk of a drought this year?
I'd say it's a matter of concern but until July is over we must keep our fingers crossed.
Has the government factored in the adverse impact of scanty rains in the Budget?
You see governments always have contingency plans.
Your predecessors always sprinkled their Budget speeches with poetry. Why did the muse desert you?
(Smiles) To impose an unfair burden on the people and then compensate them with humour or poetry, is not a part of my style.
Thank you Mr Jaitley .